Saturday, April 23, 2011

ब्राह्मण मतलब ........बुरा मन

माथे तिलक , हाथ जयमाला ,जग ठगने कुं स्वांग बन्याया !
मार्ग छांडी कुमारग साँची, प्रीती बिनु राम न पाया !! (रेदास )
द्वारा Aar Ravi


हे धूर्त चपटी
तुम्हारा चन्दन का टीका
मेरी कलम  से ज्यादा
उपयोगी नहीं ,
मुझे पता है
तुम्हारे  जनेऊ में
मरी हुई जुओं की
गंध आती है
जिनमे  जीवन का   नहीं
मौत का भय  दिखता है ,
मेरे देह का पसीना
और गंध
तुम्हारे सड़े हुए जनेऊ से
लाख गुना  बहतर है ,
आओ , मेरे पसीने से
अपने बदन को रगडो
और महसूस करो
कि बू की कोई भाषा नहीं होती
और गंध का कोई वजूद नहीं होता .............मुकंद दा एक विद्रोही कवि

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