Friday, February 7, 2014

वैधानिक चेतवानी : इस पोस्ट को पढने से कुछ की भावना आहात हो सकती है


Manisha Pandey
जब मैं इलाहाबाद शहर में बड़ी हो रही थी तो मुझे ऐसा लगता था कि इस धरती पर मेरा जन्‍म इसीलिए हुआ है कि एक दिन मुझे शादी करके दूसरे के घर जाना है और उस दूसरे घर के हिसाब से एडजेस्‍ट करना है, उस दूसरे घर में सबको खुश रखना है, इस घर और उस घर की लाज टाइप किसी चीज को प्रोटेक्‍ट करना है, सबकी नाक बचानी है। इसलिए मुझे उस घर के हिसाब से आज, अभी और इसी घर में सारी तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए। जैसेकि उस घर में कैसे चलना चाहिए, कैसा हंसना चाहिए, कैसे बात करनी चाहिए, किससे और कितनी बात करनी चाहिए, कितने डेसीमल में आवाज से गले से बाहर आनी चाहिए, किसके सामने आनी चाहिए और किसके सामने बिलकुल नहीं आनी चाहिए, कितना लजाना चाहिए, कितना दांत दिखाना चाहिए, सबको सिर झुकाकर हां जी, हां जी करना चाहिए, कैसे और क्‍या-क्‍या पकाना चाहिए, खाना पकाते-पकाते आधा बीच में ही नहीं खा लेना चाहिए, खाना बनाते हुए कुछ जूठा नहीं करना चाहिए, हर काम को कितने सलीके से करना चाहिए, जबान नहीं लड़ानी चाहिए, पलटकर जवाब नहीं देना चाहिए, ज्‍यादा घूमने-फिरने का मन नहीं करना चाहिए, ज्‍यादा कूदना नहीं चाहिए, दुपट्टा सलीके से ओढ़ना चाहिए, शरीर को हमेशा खूब ढंककर रखना चाहिए, पीरियड्स के स्‍टेन दिखने नहीं चाहिए, दुनिया में किसी को बताना नहीं चाहिए कि तुम्‍हें पीरियड्स हैं, भाई के दोस्‍तों से बात करने में इंटरेस्‍ट नहीं दिखाना चाहिए, लड़कों और इश्‍क-मुहब्‍बत में तो बिलकुल इंटरेस्‍ट नहीं होना चाहिए, आय लव सेक्‍स तो अपनी अर्थी पर भी मुंह से नहीं निकलना चाहिए, सबकी इज्‍जत करनी चाहिए, चाहे वो आपकी दो कौड़ी की इज्‍जत न करें वगैरह वगैरह वगैरह।
सेव मी। इतना ज्ञान दिया गया है कि अब इस ज्ञान की एक लाइन दादी, नानी, काकी, चाची, बुआ, मौसी, दीदी, भाभी कोई भी बोले तो मैं उत्‍तर प्रदेश में एटम बम गिराने को भी सपोर्ट करूंगी।

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