Sunday, October 16, 2011

सूर्पनखा आज जी युवतियों के लिए एक आदर्श है

♦ विजयेंद्र सिंह
राम और लक्ष्मण दंडका की संप्रभुता का उलंघन करते हैं। सूर्पनखा गण-कन्या थी। उसका अपना गण-राज्य था। बिना अनुमति के किसी राज्य में प्रवेश करना तो सीमा का उलंघन ही था। इस अमर्यादित आचरण के लिए राम- लक्ष्मण दोनों भाई जिम्मेवार थे। सूर्पनखा का न्याय कितना बेहतर था कि सजा के रूप में राम का हाथ मांगा, प्यार मांगा। राम झूठ बोलते हैं और कहते हैं कि मेरे साथ तो सीता है, लक्ष्मण अकेला है ..। और टाइम पास के लिए लक्ष्मण की ओर जाने को कहते हैं। बहुत भद्दा दृश्य है। राम का सामंती और मर्दवादी चेहरा उभर कर सामने आता है। एकदम स्त्री विरोधी चरित्र? प्रणय की ही तो बात की थी सूर्पनखा ने, कौन सा अपराध कर दिया था? कम से कम सीता की तरह बेवकूफ औरत तो सूर्पनखा नहीं ही थी। सीता की नापसंद और पसंद का क्या अर्थ था? सीता से ज्यादा मूल्यवान तो वह निर्जीव धनुष था, जो उसे तोड़ता उसके साथ सीता बांध दी जाती। सीता का व्यक्तित्व एक वस्तु से ज्यादा कुछ था ही नहीं? संयोग से दशरथ का बेटा धनुष तोड़ता है अन्यथा अपराधी भी धनुष तोड़ता तो सीता को उनके साथ जाना होता?
सूर्पनखा प्रगतिशील संस्कृति की रोल मॉडल हैं। आधुनिक स्त्री को इस पर गर्व करना चाहिए। लोहिया ने भी कहा था कि सीता के बजाय द्रौपदी स्त्री मुक्ति की आवाज है।
लक्ष्मण ने सूर्पनखा की ही नाक नहीं काटी, बल्कि स्त्री-जाति पर नकेल कसने की साजिश थी वो? सूर्पनखा उस समय गंधर्व-संस्कृति का हवाला देती है। उनके सपनों का समाज आज बनता दिख रहा है। आज गंधर्व-रीति से भी समाज बहुत आगे आ गया है। सहजीवन ही नहीं, बल्कि समलैंगिकता से भी आगे की बात हो चुकी है। सूर्पनखा के योगदान को भुलाना उचित नहीं होगा? यथास्थितिवादियों की दृष्टि में सूर्पनखा अराजकतावादी हो सकती हैं, पर इस समझ का क्या करना है?
दलित को बदसूरत बना कर पेश करना एक आदत है। उनकी स्वतंत्रता का मजाक उड़ाने के लिए ही तो तुलसी को महान बनाया गया। आज जबकि सूर्पनखा हर घर की मॉडल है, आज संप्रभुओं की हर बेटियां सूर्पनखा की राह पर है, संप्रभु स्त्री स्वतंत्र हो तो सुष्मिता और दलित करे तो सूर्पनखा? राम की संस्कृति हार रही है। इसे हारना ही है। गुस्सा रावण पर उतारा जा रहा है। खिसियाई बिल्ली खंभा नोचे? रावण ने मेहनत कर सोने की लंका बनायी थी, कोई अयोध्या को लूट कर नहीं। आज भी दलित-वंचितों की लंका जल रही है। उनकी गाढ़ी कमाई पर रामवंशियों की गिद्ध दृष्टि आज भी लगी है। रावण को जलाने वालों का चेहरा पहचानो। ये सभी भारत का भविष्य जलाने वाले हैं। राम का भी अपराध कम नहीं। आओ नये दहन की शुरुआत करें।
रंजन said: राम के अंधे भक्तों… मूर्खों… “नाक कटना” एक मुहावरा है जिसका अर्थ आज भी यही होता है- इज्जत चली जाना। इस लिहाज से “नाक काट” लेने का मतलब क्या हुआ, जरा खुद ही अंदाजा लगाना। यानी राम और लक्ष्मण ने अगर मिल कर शूर्पनखा की “नाक काटी” तो यहां वाल्मीकि ने रूपक के तौर पर बताया है कि राम और लक्ष्मण ने शूर्पनखा के साथ क्या किया। अब तुममें से कौन भाई ऐसा होगा जो अपनी बहन के साथ वैसा होने पर राम-लक्ष्मण जैसे लोगों की पूजा करेगा?
एक तरफ राम है जिसने सिर्फ प्रणय निवेदन पर शूर्पनखा पर वैसा अत्याचार किया और दूसरी ओर रावण है जो सीता को लेकर गया भी तो जब तक रखा, उसे छुआ तक नहीं।
इतनी मामूली बात अगर समझ में नहीं आती तो ठस्स बने रहो।
दूसरी बात, शूर्पनखा का नाम दरअसल सुरूपनखा था, यानी वह सिर से लेकर पांव के नख तक अपने समय की सबसे सुंदर मानी जानी वाली महिलाओं में से एक थी। और विजयेंद्र जी ने बिल्कुल सही कहा है कि वह अपने समय की एक सशक्त स्त्री थी, सीता के मुकाबले तो बहुत आगे। लेकिन दोनों मर्दों ने जो किया, वह आज भी ज्यों का त्यों चला आ रहा है। और आज भी जो उस कुंठा से लैस है, वही राम और लक्ष्मण के उस कुकर्म का बचाव करता है।
लेकिन जब अंधे रामभक्त शंबूक की हत्या तक की वकालत करते हैं, तो बाकी क्या। वे सुरूपनखा का “नाक काटने” या सीता को बाघ-शेरों के बीच जंगल में छोड़ देने को क्यों नहीं “मर्यादा” का पालन घोषित करेंगे।
बाकी हनुमान से लेकर दूसरी तमाम बातें लेखक ने बिल्कुल सही विश्लेषित किया है। अब इस नजरिए से समूची रामकथा की परतें उघाड़ी जा रही हैं। अब कोई भी सामंती मानसिकता वाला व्यक्ति कुढ़ के या चिढ़ के या कूथ के इसे रोक नहीं सकेगा।
वाल्मीकि ने पूरी रामायण की रचना दरअसल व्यंग्य विधा में किया है, जिसमें सारी बात प्रतीकों में कही है। उसे व्यंग्य मान कर पढ़ो। उसके बाद राम या लक्ष्मण जैसे लोगों का चरित्र तुम लोगों को किसी अपराधी से कम नहीं लगेगा। वरना तुलसी की चुटिया को सहलाते रहो।
http://mohallalive.com/2011/10/05/new-thaught-about-soorpanakha/

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