Thursday, February 21, 2013

क्या दलित समुदाय के लिए इस 'ग्राम स्वराज्य' का कोई मतलब है

Sunil Kumar 'suman'


ग्रामीण विकास को समर्पित द्विमासिक और द्विभाषिक पत्रिका- ''सोपान स्टेप'' के सात वर्ष पूरे होने पर अक्तूबर,2012 का अंक वार्षिकांक के रूप में आया है। यह अंक आज के संदर्भ में ''ग्राम स्वराज्य की प्रासंगिकता'' के सवाल पर आधारित है। भारतीय गांवों को लेकर खासा खुशफहमी पाली जाती रही है। खासतौर पर गांधीजी की 'ग्राम स्वराज्य' की अवधारणा को भी काफी महिमामंडित किया जाता रहा है। क्या दलित समुदाय के लिए इस 'ग्राम स्वराज्य' का कोई मतलब है जबकि भारतीय गाँव हमेशा से जातिवाद के सबसे बड़े गढ़ रहे हैं ? क्या यह अकारण था कि बाबासाहब डॉ. अंबेडकर ने गांवों को ''गणतन्त्र का सबसे बड़ा दुश्मन'' कहा ? मैंने अपने लेख में इसी दृष्टिकोण से कुछ बातें उठाई हैं...


1 comment:

  1. प्राचीन भारतीय समाज वर्णाश्रम-व्यवस्था पर-आधारित था। वर्ण का निर्धारण उस व्यक्ति के गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर किया जाता था।
    जन्म के कारण किसी को न ऊँचा माना जाता था और न नीचा। शिक्षा का सबको समान अवसर था। वेद पढ़ने एवं यज्ञ करने का सबको समान अवसर था। वेद पढ़ने एवं यज्ञ करने का सबको समान अधिकार है, यह विचार तब भली-भाँति बद्धमूल था। ‘पंचजनाः मम होत्रं जुषध्वम्’ तथा ‘पाजजन्यः पुरोहितः’ प्रभृति वेद मन्त्रों में सभी के लिए यज्ञ-यागादि धार्मिक कृत्यों का विधान है। पज्जजनाः का अर्थ निरुक्त के अनुसार ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण तथा पाँचवाँ निषाद है। वेदों में कहीं छूत-अछूत, स्पृश्यास्पृश्य या ऊँच-नीच की अवधारणा नहीं हैं।


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