Thursday, January 31, 2013

वात्स्यायन के कामसूत्र को एक औरत की चुनौती

Rashtriya Sahara New Delhi dated: 30/01/2013 Page 2
http://www.samaylive.com/regional-news-in-hindi/rajasthan-news-in-hindi/191177/vatsyayana-kamasutra-a-woman-jaipur-literature-festival-indira-c.html

अजित राय जयपुर । मलयालम लेखिका केआर इंदिरा ने वात्स्यायन के सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘कामसूत्र’ को चुनौती दे डाली है। अपने शोध के आधार पर इंदिरा कहती हैं कि वात्स्यायन का ‘कामसूत्र’
स्त्री विरोधी है। इस मर्दवादी ग्रंथ के कारण भारतीय औरतों को सदियों से यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा है। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एक विशेष बातचीत के दौरान इंदिरा ने अपनी पुस्तक ‘स्त्री कामसूत्र’ पर विस्तार से चर्चा की। यह किताब अंग्रेजी में अनूदित होकर अगले महीने बाजार में आ रही है। इंदिरा ने वात्स्यायन के कामसूत्र की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि इसके पहले के सात अध्याय व्यभिचार और यौन शोषण को सैद्धांतिकी में बदल रहे हैं। वह कहती हैं कि ‘कामसूत्र’ का एक अध्याय जहां यह बताता है कि कम उम्र की लड़कियों के साथ कैसे यौन संबंध बनाएं तो दूसरी ओर अध्याय में सिखाया गया है कि दूसरों की पत्नियों के साथ सहवास कैसे करें। एक अलग अध्याय वेश्यागमन की विधियों के बारे में है। केरल के देवीकुलम (मुन्नार) में आकाशवाणी की कार्यक्रम अधिकारी इंदिरा अपनी किताब के सिलसिले में जब शोध कर रहीं थीं तो मदरे ने उनका काफी मजाक उड़ाया। कुछ ने तो उनके साथ ‘टेलीफोन सेक्स’ करने की इच्छा भी जताई। जब वह 22 साल की थीं तो ‘कामसूत्र’ की ओर आकषिर्त हुई। तब उन्हें स्त्रियों के लिए इस वर्जित विषय पर कुछ भी लिखने का साहस नहीं हुआ। अब 48 साल की उम्र में उन्होंने ‘स्त्री कामसूत्र’ लिखी है। यह किताब सेक्स के बारे में औरतों का पक्ष सामने रखती है और कई मर्दवादी भ्रांतियों का निराकरण करती है। इंदिरा कहती हैं, ‘ मेरी किताब मदरे को औरतों के अनुकूल बनाती है। यह मदरे के हक में है कि वे सुखमय जीवन के लिए खुद को बदलें।’
इंदिरा को पवन के. वर्मा की किताब ‘कामसूत्र-स्त्री की प्रेम करने की कला’ की व्याख्याओं पर आपत्ति है। पवन वर्मा लिखते हैं, ‘ सेक्स की इच्छा ईर का उपहार है। स्त्री की सहमति से संभोग जायज है। हमें इस इच्छा का उत्सव मनाना चाहिए। यदि समाज में ‘कामसूत्र’
की स्वीकृति नहीं होती तो खजुराहो के मंदिर नहीं होते।’ इंदिरा का जोरदार तर्क है कि खजुराहो जैसे मंदिर राजाओं ने बनवाए। एक मंदिर के आधार पर हम पूरे राष्ट्र के यौन जीवन की व्याख्या नहीं कर सकते। राजाओं और शासकों के लिए जो सच्चाई थी, उसे आप आज जनता की सच्चाई कैसे कह सकते हैं? ‘कामसूत्र’ और खजुराहो के पीछे भारत की आम जनता नहीं, शासक वर्ग था। हमें अपने इतिहास को ठीक से पढ़ने की जरूरत है। पवन वर्मा के इस सवाल पर कि हजारों सालों में ‘कामसूत्र’ का विरोध क्यों नहीं हुआ, इंदिरा कहती हैं- भारत में सेक्स जैसे विषयों पर स्त्रियों को बोलने की आजादी नहीं थी। इसलिए वे आज तक चुप रहीं। दरअसल, पहली बार ‘कामसूत्र’ की अंग्रेजी व्याख्या यशोधरा आचार्य ने की जिसे र्रिचड बर्टन ने जयपुर में ही 1883 में प्रिंट किया। इंदिरा कहती हैं कि हम ‘कामसूत्र’ या खजुराहो का उदाहरण देकर मर्दवादी सोच को न्यायोचित नहीं ठहरा सकते। यह हो सकता है कि भारत में राजाओं और शासक वर्ग को सेक्स की खुली छूट रही हो, पर आम जनता तो वैसी नहीं थी। यह वैसा ही झूठ होगा जैसे कुछ औरतों को आजाद देखकर हम भारत की 59 करोड़ स्त्रियों को आजाद मान लें।

10 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  2. अभी हंगामा है बाकी

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  3. naribad aur purusbad ki ladaye ko yatharthbad ke najariye se dekha jana hi behatar hoga,tark me dam to hai magar yah ak bahas ka mudda bhi,hangame to hote rahe hai aur hote rahenge,sawal surat badlne se juda hua hai

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  4. सदियों की मानसिकता है समय लगेगा परन्तु बदला जाना आवश्यक है.
    दुष्यंत की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं.
    आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
    सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.

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  5. बहुत ही सशक्त प्रस्तुति | आभार |

    Tamasha-E-Zindagi
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  6. बेशक कामसूत्र मर्द वादी सोच का प्रक्षेपण हैं .स्त्री को पत्नी रूप में वैश्या की तरह काम कला प्रवीण होने की हिमायत करता है .साथ ही नायक नायिका वर्गीकरण लिंग और योनी के आकार के अनुसार

    करता हुआ विज्ञान सम्मत जामा भी पहन लेता है .सम्भोग कला की दीक्षा है कामसूत्र .

    सम्भोग से समाधि पुस्तक में यह पुरुष केन्द्रित झुकाव नहीं था .

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  8. कामसूत्र... आज भी सार्वजनिक रूप से इस पुस्‍तक की चर्चा करना तो दूर इसका नाम लेना भी कई लोगों को असहज कर देता है। लोगों की नजर में इस ग्रंथ की बात करना अनैतिक माना जाता है। लोग यही मानते हैं कि यह एक यौन ग्रंथ है जिसमें केवल सेक्‍स की बातें की गयी हैं। और सेक्‍स तो वैसे ही भारतीय समाज में चारदीवारी के पीछे बोले जाने वाली शब्‍दावली का हिस्‍सा है। इस पर न तो सार्वजनिक मंचों पर चर्चा की जाती है और ही ऐसा करना उचित ही माना जाता है। क्योंकी काम के अभाव में सृष्टि सृजन का अभाव होगा और सृष्टि सृजन के अभाव में सृष्टि का विनाश तय है । योन शिक्षा से योन अपराधों पर रोक?
    यौन कुंठा से होने वाले अपराधों का निदान उचित यौन शिक्षा से ही निकाला जा सकता है। यह बात विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) ने अब कहनी शुरू की है, जबकि भारत में 1600 साल पहले ही ऋषि वात्स्यायन यह बात कह गए हैं। वात्स्यायन के अनुसार यह शिक्षा प्राग यौवने अर्थात यौवन काल शुरू होने से ठीक पहले यानी किशोरावस्था में दी जानी चाहिए। पहले यौवन काल की शुरुआत 16 से 18 वर्ष की उम्र में होती थी। लेकिन अब संचार माध्यमों से मिल रही जानकारियों एवं खुलेपन के माहौल के कारण यौवन काल 11-12 वर्ष की उम्र से ही शुरू हो जाता है। इसलिए उचित तरीके से यौन शिक्षा इस उम्र से पहले ही बच्चों को दी जानी चाहिए। इसकी शुरुआत परिवार में माता-पिता से ही होनी चाहिए। जब बच्चों को सही उम्र में अच्छे-बुरे की जानकारी दे दी जाएगी तो वह कुंठा के शिकार नहीं होंगे। यौन शिक्षा की बात आते ही एक वर्ग द्वारा इसका विरोध होने लगता है। वास्तव में यौन शिक्षा का अर्थ ऐसा आचरण सिखाने से है, जिसका अभ्यस्त होकर व्यक्ति भविष्य में संतुलित व्यवहार कर सके।
    पिछले दशकों में योन शिक्षा को दुनिया के कई शिक्षण संस्थानों में लागु किया गया है
    वात्‍स्‍यायन ने ब्रह्मचर्य और परम समाधि का सहारा लेकर कामसूत्र की रचना गृहस्‍थ जीवन के निर्वाह के लिए की . इसकी रचना वासना को उत्तेजित करने के लिए नहीं की गई है. संसार की लगभग हर भाषा में इस ग्रन्थ का अनुवाद हो चुका है. इसके अनेक भाष्य और संस्करण भी प्रकाशित हो चुके हैं. वैसे इस ग्रन्थ के जयमंगला भाष्य को ही प्रमाणिक माना गया है. कामशास्‍त्र का तत्व जानने वाला व्‍यक्ति धर्म, अर्थ और काम की रक्षा करता हुआ अपनी लौकिक स्थिति सुदृढ़ करता है. साथ ही ऐसा मनुष्‍य जितेंद्रिय भी बनता है. कामशास्‍त्र का कुशल ज्ञाता धर्म और अर्थ का अवलोकन करता हुआ इस शास्‍त्र का प्रयोग करता है. ऐसे लोग अधिक वासना धारण करने वाले कामी पुरुष के रूप में नहीं जाने जाते.

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