Saturday, May 7, 2011

In the mirror of Wikileaks of we looks like slave of USA

♦ Pankaj Bisht U.S. government but also Western bloc Julian Asanj lives of all the land lying behind the way, he proved himself on the authenticity of Avikailics offers. If the slightest doubt the authenticity of these documents is a citizen of the U.S. government secret document his charge to the public from November until today would have happened without trial run did not stop. As Asanj love the feedback given to NDTV said in the interview, it's not the kind to be first to be revealed. Before the institution of the 120 countries have a variety of public documents. The killings in East Timor from Kenya in Africa include billions of rupees case of corruption. At a time when Western governments did not say that these facts are wrong or that way is wrong. Themselves and the world's largest democratic country of expression Azadiwala Bhlanewala U.S. end its disclosures about Honewale is why so restless? Asanj interview given to the opinion because it has two Oukk way. According to him the truth about America today is that 30 to 40 percent of its economy is engaged in the security field. So it has so many secrets, too many computers, and many people in the State Department, government, military. March 28 published in the Hindu Avikailics content on trying to sell weapons to India from the U.S. was concerned. Accordingly, the U.S. ambassadors in Delhi various messages sent to their government (ie cable wire), it is told that India's arms market is 27 trillion dollars and we should do to share it. Here it is important to inform the world at the moment of India's biggest buyers of arms and could not shake the U.S. economy is still bearish. Where unemployment is growing constantly. That apart, the rest of the U.S. interests is an issue of arms sales, which led the U.S. can not ignore the Indian market. On this issue is linked to another and that the superpower on the world to maintain their domination of everything. Go on America, Afghanistan, Iraq and is now interfering in Libya. In fact, American power is such that the pressure forces from Iraq came to power on call assured taking Libya to attack Obama's put up in no time. Goki it is in the name of the United Nations. Obama is clear that American arms and oil industry to step from the pressures are not in a position to do any work. But it is clear that the American public is not otherwise Yuddhonemadi how Obama become president.Iraq conflict has been tremendous over the American public why U.S. Libya protect the public there to fight so-called democracy has Thamayaie NATO command, yet it is nothing more than Zoncne dust in the eyes. What's all this content to Avikailics restorative person involved in the Iraq war is a former soldier. The public discontent with his government and Hramhang is a perfect example. It also proves the fact that the United Nations in the grip of the extent to which U.S. and allied interests is the extent to which the Western bloc. Disclosures published in the Hindu on India given the stamp of authenticity to it is just how the Indian economy since the Narasimha Rao government, politics and power on the Western bloc, particularly the holding of American power began to be strong and NDA Today it was the government would have reached the stage, be it nuclear energy bill, the vote in parliament over the U.S. makes clear discomfort. It is surprising why a Congress activist who told the CIA agent that MPs are ready to buy Rs 50 crore.Where the money come from? What the U.S. can not? Up on questions like this is Lajmi. The thing to look at how the Indian government ministers in the U.S. takes an interest in having been created, and his interest in how people are. For example, he wants to Montek Singh Ahluwalia was the Finance Minister Mani Shankar Aiyar and the Petroleum Ministry had to move so much because American interests - the oil line in the case of Iran - were giving precedence to the interests of India. Meanwhile, BJP leader Arun Jaitley BJP Domunhapan the case with the United States makes clear. This then becomes clear that as far as America is an issue - basically there is no difference between the two parties. Hinduism is one clog, then left for another tilt. It is sad that such - so-called economic power like India is becoming the way - the way the economic or political, is far from being its own independent policies. In foreign affairs, India has been about U.S. Piattw. This will surely both the BJP and Congress questioned the credibility of Avikailics every few tries to figure. (The April 2011 editorial of the time difference ...) (Pankaj Avisht. Senior Hindi writer. Important to consider the time difference, editor of the magazine.'re Long in the Indian Information Service. Novell, but had much discussion on the door. Her than many of his novels and story collections. them can be contacted at.)

♦ पंकज बिष्‍ट
मेरिकी सरकार ही नहीं बल्कि पश्चिमी खेमे के सारे देश जूलियन असांज की जान के पीछे जिस तरह से पड़े हुए हैं, वह विकीलीक्स की प्रामाणिकता को स्वयं ही सिद्ध कर देता है। अगर इन दस्तावेजों की प्रमाणिकता में जरा भी शक होता तो अमेरिका ने अपने एक नागरिक को सरकारी गुप्त दस्तावेज सार्वजनिक करने के आरोप में नवंबर से आज तक बिना मुकदमा चलाये बंद नहीं किया हुआ होता।
जैसा कि असांज ने एनडीटीवी के प्रणय राय को दिये साक्षात्कार में कहा है, ऐसा नहीं है कि इस तरह का खुलासा पहली बार हो रहा हो। इससे पहले इस संस्था ने 120 देशों के बारे में विभिन्न किस्म के दस्तावेजों को सार्वजनिक किया है। इसमें केन्या से ईस्ट तिमोर में हुई हत्याओं से लेकर अफ्रीका में खरबों रुपयों के भ्रष्टाचार तक के मामले शामिल हैं। पर तब पश्चिमी देशों की सरकारों ने एक बार भी नहीं कहा कि ये तथ्य गलत हैं या फिर यह तरीका गलत है।
स्वयं को दुनिया का सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक और अभिव्यक्ति की आजादीवाला देश बतलानेवाला अमेरिका आखिर अपने बारे में होनेवाले खुलासों से इतना बेचैन क्यों हो गया है? असांज ने राय को दिये साक्षात्कार में इसके कारण को दो टुक तरीके से रखा है। उनके अनुसार, अमेरिका के बारे में सत्य यह है कि आज इसकी 30 से 40 प्रतिशत अर्थव्यवस्था सुरक्षा क्षेत्र में लगी हुई है। इसलिए इसके बहुत सारे रहस्य हैं, बहुत सारे कंप्यूटर हैं, और इसके गृह विभाग में बहुत सारे लोग हैं, सरकार में, सेना में।
28 मार्च के हिंदू में प्रकाशित विकीलीक्स की सामग्री का संबंध अमेरिका द्वारा भारत को हथियार बेचने की कोशिश से ही संबंधित था। इसके अनुसार दिल्ली स्थित अमेरिकी राजदूतों ने अपनी सरकार को भेजे गये विभिन्न संदेशों (केबल यानी तार) में यह बतलाया है कि भारत का शस्त्रों का बाजार 27 खरब डालर का है और हमें इसमें हिस्सेदारी के लिए क्या करना चाहिए। यहां यह बतलाना जरूरी है कि भारत इस समय दुनिया के हथियारों के सबसे बड़े खरीदारों में से है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था अभी भी मंदी से नहीं उबर पायी है। वहां लगातार बेरोजगारी बढ़ रही है। इसलिए अमेरिका के बाकी हितों को छोड़ दें तो भी हथियारों की बिक्री ऐसा मसला है, जिसके चलते अमेरिका भारतीय बाजार की अनदेखी नहीं कर सकता।
पर इसी से जुड़ा एक और मसला भी है और वह है इस महाशक्ति का दुनिया पर अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए सब कुछ करने का। इसके चलते अमेरिका, अफगानिस्तान, इराक और अब लीबिया में हस्तक्षेप कर रहा है। असल में अमेरिकी सत्ता के दबाव ऐसे हैं कि इराक से सेनाएं बुला लेने के आश्वासन पर सत्ता में आये ओबामा ने लीबिया पर आक्रमण करने में देर नहीं लगायी है। गोकि यह भी संयुक्त राष्ट्र संघ की आड़ में किया गया है। साफ है कि ओबामा अमेरिकी शस्त्र और तेल उद्योग के दबाव से हट कर कोई काम कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। पर यह तो साफ ही है कि अमेरिकी जनता युद्धोन्मादी नहीं है अन्यथा ओबामा कैसे राष्ट्रपति बनते। इराक को लेकर अमेरिकी जनता में जबर्दस्त विरोध रहा है और इसीलिए अमेरिका ने लीबिया में जनता को बचाने और वहां तथाकथित लोकतंत्र स्थापित करने की लड़ाई की कमान नाटो को थमायी हुई है, इसके बावजूद कि यह आंखों में धूल झोंकने से ज्यादा कुछ नहीं है। यही नहीं विकीलीक्स को यह सारी सामग्री देनेवाला व्यक्ति भी इराक के युद्ध में शामिल एक पूर्व सैनिक ही है। यह अपनी सरकार से जनता के असंतोष और भ्रमभंग का एक पुख्ता उदाहरण है। यह इस बात को भी सिद्ध करता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ किस हद तक अमेरिका की गिरफ्त में है और किस हद तक पश्चिमी खेमे के हित उससे जुड़े हैं।
हिंदू में प्रकाशित भारत संबंधी खुलासों ने सिर्फ इस बात पर प्रमाणिकता की मुहर लगा दी है कि किस तरह से नरसिंह राव सरकार के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था, राजनीति और सत्ता पर पश्चिमी खेमे, विशेष कर अमेरिकी सत्ता की पकड़ ने मजबूत होना शुरू किया और एनडीए की सरकार से होती हुई यह आज जिस मुकाम पर पहुंच गयी है, उसे परमाणु ऊर्जा बिल पर संसद में होने वाले मतदान को लेकर अमेरिकी बेचैनी स्पष्ट कर देती है। यह चकित करनेवाला है कि क्यों एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने सीआईए के एजेंट को बतलाया कि सांसदों को खरीदने के लिए 50 करोड़ रुपया तैयार है। यह रुपया कहां से आया? क्या यह अमेरिकी नहीं हो सकता? जैसे सवालों का उठना भी इस संबंध में लाजमी है। पर देखने की बात यह है कि किस तरह से अमेरिका भारतीय सरकार में मंत्रियों के बनाये जाने में भी रुचि लेता रहा है और उसकी रुचि किस तरह के लोगों में रही है। उदाहरण के लिए वह मोंटेक सिंह अहलूवालिया को वित्तमंत्री बनाना चाहता था और मणि शंकर अय्यर को पैट्रोलियम मंत्रालय से इसलिए हटना पड़ा क्योंकि वह अमेरिकी हितों से ज्यादा – ईरान से तेल लाइन के मामले में – भारत के हितों को तरजीह दे रहे थे।
उधर भाजपा नेता अरुण जेटली का मामला भी अमेरिका को लेकर भाजपा के दोमुंहेपन को स्पष्ट कर देता है। इससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि जहां तक अमेरिका का मसला है – मूलत: दोनों दलों में कोई अंतर नहीं है। एक के लिए हिंदुत्व आड़ है, तो दूसरे के लिए वामपंथी झुकाव। दुखद यह है कि जैसे-जैसे भारत तथाकथित आर्थिक शक्ति बनता जा रहा है वैसे-वैसे वह आर्थिक हो या राजनीतिक, अपनी स्वतंत्र नीतियों से दूर होता जा रहा है। विदेशी मामलों में तो भारत लगभग अमेरिकी पिट्ठू हो चुका है। इससे यह जरूर होगा कि अब भाजपा और कांग्रेस दोनों ही विकीलीक्स की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाने की हर चंद कोशिश करेगी।
(यह अप्रैल 2011 के समयांतर का संपादकीय है…)
(पंकज विष्‍ट। वरिष्‍ठ हिंदी कथाकार। विचार की महत्‍वपूर्ण पत्रिका समयांतर के संपादक। भारतीय सूचना सेवा में लंबे समय तक रहे। नॉवेल लेकिन दरवाजा को काफी चर्चा मिली। इसके अलावा भी उनके कई उपन्‍यास और कहानी संग्रह हैं। उनसे पर संपर्क किया जा सकता है।)


  1. लीबिया. में संघर्ष पर ग्रंथ:

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