Tuesday, April 26, 2011

अध्याय 15 : अपवित्र और अछूत

कट्टर रूढ़िवादियों का कहना है कि अस्पृश्यता अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है। क्योंकि अस्पृश्यता के बारे में न सिर्फ़ स्मृतियों में दिया है बल्कि धर्म सूत्रों में भी, जो कि कुछ विद्वानों के अनुसार ईसा के पहले लिखे गए हैं।

ये ठीक बात है। मगर क्या धर्म सूत्र में अस्पृश्यता और अछूतों का उल्लेख उन्ही अर्थों में हुआ है जिन अर्थों में हम आज समझते हैं? धर्म सूत्र अस्पृश्य के साथ कुछ अन्य शब्दों का भी उपयोग करते हैं; अन्त्य, अन्त्यज, अन्त्यवासिन, और वाह्य। इन शब्दों का प्रयोग स्मृतियों में भी हुआ है। तो क्या अन्त्य, अन्त्यज आदि इन शब्दों का भी वही अर्थ है जो अस्पृश्य का?

दुर्भाग्य से इन शब्दों का प्रयोग धर्म सूत्र में बहुत सीमित है और कहीं भी यह नहीं बताया गया है कि इन शब्दों अन्तर्गत कौन कौन सी जातियां आती हैं ? स्मृतियों में बताया है। मगर हर जगह अलग अलग जातियां दी गई हैं, कहीं सात कहीं बारह। उदाहरण के लिये वेदव्यास स्मृति के अनुसार चाण्डाल और श्वपाक अन्त्यज हैं किन्तु अत्रि स्मृति के अनुसार नहीं। अत्रि के अनुसार बुरुद और कैवर्त अन्त्यज हैं मगर वेदव्यास के अनुसार नहीं।

कहने का सार यह है कि न तो धर्म सूत्र और न ही स्मृतियों से कुछ निश्चय हो पा रहा है। फिर ये ग्रंथ यह भी नहीं बताते कि ये अन्त्य, अन्त्यज, अन्त्यवासिन, और वाह्य अस्पृश्य थे या नहीं? इनके बारे में जो अलग से जानकारी है शायद उस से कुछ सहायता मिले।

जैसे मनु ने वाह्य का उल्लेख किया है। मगर उसको समझने के लिए मनु के वर्गीकरण को समझना ज़रूरी है। मनु लोगों केपहले दो वर्ग बनाते हैं, १) वैदिक और २)दस्यु। फिर वैदिक जनों को चार उप वर्ग में बिभाजित करते हैं;
१) जो चातुर्वर्ण के भीतर हैं
२)जो चातुर्वर्ण के बाहर हैं
३)ब्रात्य
४)पतित या जाति बहिष्कृत

चातुर्वर्ण के भीतर वही जन गिने जाते थे जिनके माता पिता का वर्ण एक ही हो। नहीं तो अलग अलग वर्ण के माता पिता की सन्तान को वर्ण संकर कह कर चातुर्वर्ण से बाहर कर दिया जाता था। चातुर्वर्ण से बाहर इन लोगों के फिर दो भेद किये गये।१)अनुलोम, जिनके पिता ऊँचे वर्ण के और माता नीचे वर्ण की२)प्रतिलोम, जिनकी माता ऊँचे वर्ण की और पिता नीचे वर्ण केअनुलोमों को मनु ने वाह्य कहा है और प्रतिलोमों को हीन किन्तु दोनों को ही अछूत नहीं कहा है।

अब अन्त्य शब्द के बारे में। अन्त्य एक वर्ग के रूप में मनु स्मृति(४.७९) में आता है फिर भी मनु उसकी गणना नहीं करते। मेधातिथि ने अपने भाष्य में कहा है कि अन्त्य का अर्थ है म्लेच्छ। बुलहर ने इस का अनुवाद नीच जाति के रूप में किया है। बृहदारण्यक उपनिषद में एक कथा है जिसमें अन्त्य शब्द का अर्थ गाँव की सीमा पर बसे हुए लोगों से लिया गया है।

अब अन्त्यज। महाभारत (शांति पर्व १०९.९) में अन्त्यजों के सैनिक होने का उल्लेख है। सरस्वती विलास के अनुसार रजकों की सात जातियां अन्त्यज में गिनी जाती हैं। वीरमित्रोदय का कहना है रजक आदि अठारह जातियां सामूहिक तौर पर अन्त्यज कहलाती हैं। मगर ये कहीं नहीं कहती कि अन्त्यज अछूत थे।

और अन्त्यवासिन? क्या वे अछूत थे? अमर कोश के अनुसार अन्त्यवासिन का अर्थ है गुरु के घर पर रहने वाला ब्रह्मचारी। ये ब्रह्मचारी जो सिर्फ़ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही हो सकते थे, अछूत नहीं हो सकते थे। वशिष्ठ धर्म सूत्र के अनुसार अन्त्यवासिन शूद्र पिता और वैश्य माता की संतान हैं। मनु के मत से वे चाण्डाल पिता और निषाद माता की संतान। मिताक्षरा का कहना है कि वे अन्त्यजों का ही एक उपवर्ग हैं।

अभी तक जो जानकारी मिली है उस से इन अन्त्यज आदि को आधुनिक अर्थों में अछूत कहना मुश्किल है। फिर भी अगर कुछ लोग ये मानते हो कि नहीं वे अछूत ही थे तो पूछा जाना चाहिये कि उस काल में अस्पृश्य का अर्थ क्या था?

उदाहरण के लिए एक अस्पृश्य जाति चाण्डाल को लें। चाण्डाल कई तरह के लोगों के लिए एक शब्द है। शास्त्रों में पाँच तरह के चाण्डालों का वर्णन है।
१)शूद्र पिता और ब्राह्मण माता की संतान
२)कुँवारी कन्या की सन्तान
३)सगोत्र स्त्री की संतान
४)सन्यासी हो कर पुन: गृहस्थ होने वाले की संतान
५)नाई पिता और ब्राह्मण माता की संतान

हम मान लेते हैं कि इन पाँचो के सन्दर्भ में शुद्ध होने के आवश्यक्ता बताई गई है। तो शुद्ध होने का शास्त्रोक्त नियम हैं;जब ब्राह्मण किसी चाण्डाल, रजस्वला स्त्री, पतित, प्रसूता, शव या उसे जिसने शव का स्पर्श किया हो, को स्पर्श करता है तो स्नान करने से शुद्ध होता है। (मनु स्मृति ५.८५)

इसी तरह के अन्य नियम दूसरे शास्त्रों में भी मिलते हैं। इन नियमों से दो बातें स्पष्ट होती हैं।
१)चाण्डाल के स्पर्श से केवल ब्राह्मण अशुद्ध होता था।
२)और सम्भवतः आनुष्ठानिक अवसरों पर ही शुद्ध अशुद्ध का विचार किया जाता था।

यदि ये निष्कर्ष ठीक है तो यह अशुद्धि का मामला है जो अस्पृश्यता से बिलकुल अलग है। अछूत सभी को अपवित्र करता है मगर अशुद्ध केवल ब्राह्मण को अपवित्र करता है। अशुद्ध का स्पर्श केवल अनुष्ठान के अवसर पर ही अपवित्रता का कारण बनता है मगर अछूत सदैव अपवित्र बनाता है।

इसके अलावा एक और तर्क है जिससे सिद्ध होता है कि धर्म सूत्र में जिन जातियों के नाम आए वे अछूत थीं। इस तर्क का आधार अध्याय २ में उल्लिखित ऑर्डर इन कौंसिल की ४२९ जातियों की सूची है। स्मृतियों और इस सूची की तुलना करने पर कुछ बातें सामने आती हैं;
१)स्मृतियों में दी गई ऐसी जातियों की अधिकतम संख्या १२ है, जबकि इस सूची में इनकी संख्या ४२९ है।
२)४२९ में ४२७ जातियों का नाम स्मृतियों में नहीं है।
३)स्मृतियों में जिनका नाम है, वे ऑर्डर इन कौंसिल की सूची में नहीं हैं।
४)केवल चमार ही एक ऐसी जाति है जो दोनों जगह है।

अगर ये दोनों सूचियां एक ही वर्ग के लोगों की हैं और ये सिर्फ़ अस्पृश्यता के विस्तार का मामला है तो इसका कारण क्या है? ऐसा कैसे सम्भव है कि अकेले चमार को छोड़कर ४२८ का तब अस्तित्व ही नहीं था? और यदि था तो उनका उल्लेख स्मृतियों में क्यों नहीं मिलता? इस प्रश्न को कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता।

अब यदि यह मान लिया जाय कि ये दो अलग अलग वर्गों की सूचियां हैं। शास्त्र वाली सूची अपवित्र जनों की है जबकि ऑर्डर इन कौंसिल वाली सूची अछूतों की तो इन सवालों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। सिवाय इस पहलू के कि चमार को दोनों सूचियों में कैसे स्थान प्राप्त है? अकेले चमार की दोनों सूचियों में उपस्थिति से यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि दोनों सूचियाँ एक ही लोगों के बारे में हैं बल्कि अगर ये समझा जाय कि ये दो सूचियां दो अलग अलग लोगों के बारे में हैं; एक अपवित्रों की और एक अछूतों की। तो सिर्फ़ इतना सिद्ध होता है कि चमार जो कभी अपवित्र थे बाद में अछूत हो गये।

स्मृतियों में वर्णित बारह अपवित्र जातियों में अकेले चमार को ही क्यों अछूत बनाया गया, ये समझना कठिन नहीं। चमार और अन्य अपवित्र जातियों ने जिस बात ने भेद पैदा किया है वह है गोमांसाहार। जब गो को पवित्रता का दरजा मिला और गोमांसाहार पाप बना, तब अपवित्र लोगों में जो गोमांसाहारी थे केवल वही अछूत बने। स्मृतियों की सूची में अकेले चमार ही गोमांसाहारी है।अस्पृश्यता के मूल कारण गोमांसाहार है और यह अपवित्रता से अलग है। यही बात छुआछूत के जन्म का काल निर्णय करने में निर्णायक सिद्ध होगी।

4 comments:

  1. शूद्र शाब्दिक दृष्टि से आशुद्रव शब्द से व्युत्पित है जिसका अर्थ है शीघ्र ही द्रवित यानि पिघल जाना |यानि जल्दी ही अपने को कि और में समिलित कर लेना |द्रवित होने वाला पदार्थ किसी भी अन्य पदार्थ के साथ अपने को समाहित कर सकता है |यह बहुत उच्च कोटि के व्यक्तियों में ही समायोजन का गुण होता है | शूद्र के बारे में पितामह भीष्म ने कहा कि यदि किसी के कुलमे कोई श्राद्ध करने वाला न हो तो उसके शूद्र को भी यह अधिकार है क्योंकि शूद्र तो पुत्र तुल्य हो है |कुछ लोगो का तर्क है कि शूद्रों कि उत्पत्ति श्री भगवान के चरणों से हुयी है इसलिए यह नीचें है उनसे मै यह पूंछना चाहती हूँ कि "वे लोग श्री भगवान के चरणों का पूजन करते है यह कि मुख और हृदय का ????" यदि चरणों का ही तब तो शूद्र अति-आदरनीय और पूज्य हुए ना ??? हम अपने गाँव में आज भी अनेक परम्पराव पर शूद्रों का पूजन करते है चाहे वो मकर-सक्रांति हो या कोई भी शुभ कार्य उसमे सबसे पहले मेहतर और महत्रानीजी को ही नेग देकर उन्हें सम्मानित किया जाता है |
    हम यदि भगवान श्री राम के समय से ही देखें तो पाएंगे कि दलितों के साथ शुरू से ही हम क्षत्रियों का व्यव्हार बहुत ही सम्मान जनक रहा है |श्री राम के निषाद-राज के साथ मैत्री-पूर्ण सम्बन्ध केवट के प्रति सहदयता जग-जाहिर है| एक और भी बड़ा ही भाव-पूर्ण प्रशंग है कि भरतजी जब श्री राम से मिलने जारहे थे तो रस्ते में निषाद-राज मिले तो उन्होंने निषाद-राज से गले मिलने से यह कह कर मन कर दिया कि जिस गले से मेरे पूज्य और अराध्य श्री राम लग चुके है और वह उनका मित्र है उसके तो मै सिर्फ चरण स्पर्श ही कर सकता हूँ |और इसके बाद श्री राम द्वारा वानर और भालू जैसी आदिम-जातियों के साथ मैत्री-पूर्ण संधि और उनकी ही सहायता से दैत्य-ब्राह्मणों (दिति और कश्यप ब्रह्माण ऋषि के वंशजो ) का संहार करके माता सीता को आजाद करवाया था |
    उसके बाद राज-सरिथि अधिरथ और संजय को मंत्री का स्तर औरयह सर्व-विदित है कि सारथि सबसे बड़ा हितेषी और मित्र होता है |और अधिकांश सारथि शुद्र ही हुआ करते थे |अब इतना पुराणी बैटन को यदि न भी याद करें तो भी महाराणा प्रताप कि सेना में भील जाति कि न केवल भरमार थी बल्कि पूंजा राणा भील को राणा का दर्जा था और अंग-रक्षक दल के प्रमुखों में एक थे |मेवाड़ के राज्य-चिन्ह में राजपूत और भील दोनों को जगह देकर भीलों को सम्मानित किया गया है |फिर यह छुआछुत प्राचीन-काल से नहीं होसकती और यह सास्वत भी नहीं है इसे निश्चित रूपसे किन्ही राजनैतिक षड़यंत्र के तहत प्रचलित किया गया होगा | इसलिए यह बात शत प्रतिशत सही है कि यह छुआ-छूत किसी षड़यंत्र के तहत ही प्रचलित कि गयी, जिसमे हमारे राजनितिक विरोधी जिनमे रावण और परशुराम के वंशजो का विशेष योगदान है| ने हमे हमारी प्राणों से भी प्रिय प्रजा, जिसके वास्तव में हम ऋणी है और दास हुआ करते थे , उसीके साथ हमारे ही हाथों से अन्याय करवाया है |...

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    1. क्या आप ऐसे विचारक को आइना दिखाना चाहते है जिनका निजी ग्रंथालय 50 हजार से भी ज्यादा ग्रंथो का सन्ग्रह था .आपके तर्क नीरा बेतुके है आंबेडकर वाद समझने के लिए ऐसे तर्क कीसी काम के नही है .
      समकालीन गांधी भी बाबासाहब को समझना सके आज के संघिस्ट ,सनातनी और समाजिस्टि यो का हाल भी उनसे अलग नही है .
      बाबासाहब के किसी भी विचार पर तर्क रखने से पहले उनके द्वारा लिखे गए 22 खण्डों का अध्ययन करे .22 प्रतिज्ञाए बाबासाहब के सम्पूर्ण विचारो का मेमोरॅडम है.

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    2. क्या आप ऐसे विचारक को आइना दिखाना चाहते है जिनका निजी ग्रंथालय 50 हजार से भी ज्यादा ग्रंथो का सन्ग्रह था .आपके तर्क नीरा बेतुके है आंबेडकर वाद समझने के लिए ऐसे तर्क कीसी काम के नही है .
      समकालीन गांधी भी बाबासाहब को समझना सके आज के संघिस्ट ,सनातनी और समाजिस्टि यो का हाल भी उनसे अलग नही है .
      बाबासाहब के किसी भी विचार पर तर्क रखने से पहले उनके द्वारा लिखे गए 22 खण्डों का अध्ययन करे .22 प्रतिज्ञाए बाबासाहब के सम्पूर्ण विचारो का मेमोरॅडम है.

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  2. Bakchodi mat pelo..pata hai tumhe yah hajam nahi hua.Tumhare jaiae hi logo k karan ye jati pratha Bani.
    Kaun RAM or kaun kishan sab dhakosla hai.

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