गुरुवार, 17 अक्तूबर, 2013 को 12:09 IST तक के समाचार

"बहुत टेंशन है....टेंशन तो हम सबको है....और सबकी टेंशन की एक ही वजह है....योनि...."
ये था पहला संवाद उस नाटक का जिसका नाम है ''किस्सा योनि का''.मैं ख़ुद को पढ़ी-लिखी, अंग्रेज़ी बोलने वाली, आज़ाद ख्यालों की, महिला अधिकारों की पक्षधर आधुनिक भारतीय महिला मानती हूं जो राजनीति, सामाजिक बदलाव, खेल, फ़िल्मों से लेकर सेक्स और यौन संबंध तक सभी विषयों पर न सिर्फ़ खुल कर बात कर लेती है बल्कि ज़ोर-शोर से बहस भी करती है.
और यहां मैं सोच रही थी कि क्लिक करें महिलाओं की लैंगिकता या सेक्शुएलिटी जैसे गंभीर मुद्दे के बारे में हिंदी में बातचीत या डॉयलॉग कहीं अश्लील तो नहीं होंगे?
ये नाटक अमरीकी नाटककार इव एंसलर के मशहूर और विवादित 'द वैजाइना मोनोलॉग्स' पर आधारित है और यौन संबंध, बलात्कार, घरेलू हिंसा, मासिक धर्म, समलैंगिकता, प्रसव जैसे मुद्दों की बात करता है.
भारत में इस नाटक के मंचन की शुरुआत अंग्रेज़ी में हुई थी लेकिन पिछले छह साल से ये हिंदी में भी किया जा रहा है.
भाषा
नाटक का निर्देशन महाबानो मोदी कोतवाल और उनके बेटे कायज़ाद कोतवाल ने किया है. कायज़ाद बताते हैं कि हिंदी में इसे करने का विचार उन्हें अपने ऐसे कई दर्शकों से मिला जो अंग्रेज़ी में इसे देखने आते थे और इसे अपनी भाषा में भी देखना-समझना चाहते थे.लेकिन भारत जैसा देश, जहां सेक्स को गंदा माना जाता है और इस बारे में झिझक कर, काना-फूसी करके बात की जाती है, वहां सबसे बड़ी चुनौती ऐसे संवेदनशील मुद्दे का अनुवाद था.
"हमारी संस्कृति में यौन संबंधों के बारे में बिना किसी शर्म के ज़िक्र है. खजुराहो है, कृष्ण की रासलीला में भी इसकी छाप मिलती है. इस विषय को हमने अश्लील बनाया है. इरादा अश्लील हो सकता है, मुद्दा कतई अश्लील नहीं है."
जयदीप सरकार, अनुवादक, द वैजाइना मोनोलॉग्स
कायज़ाद कहते हैं, “डर ये था कि ग़लत हाथों में ये बहुत ग़लत चीज़ बन सकती थी. इसके लिए हमारे अनुवादकों, ऋतु भाटिया और जयदीप सरकार, ने काफ़ी शोध किया. हम चाहते थे ये नाटक ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचे लेकिन साथ ही किसी भी समुदाय या प्रांत या भाषा के लोगों को बुरा न लगे.”
वर्षा अग्निहोत्री पिछले चार साल से ज़्यादा समय से इस नाटक में ऐक्टिंग कर रही हैं. वे कहती हैं कि जब इस नाटक का रूपांतरण हो रहा था तब उनके मन में भी इसकी भाषा को लेकर कहीं एक डर था.
वर्षा कहती हैं, “इस नाटक की लेखिका अमरीकी हैं इसलिए ये उसी परिप्रेक्ष्य और अमरीकी संदर्भों को ध्यान में रखकर लिखा गया है. इसलिए जब इसका हिंदी में अनुवाद हो रहा था तब हमें डर था कि पता नहीं क्या होगा और कैसे होगा. लेकिन इसके अनुवाद का कमाल ये है कि इसमें हिंदी भाषा और बोलियों की काव्यात्मकता को बरक़रार रखा गया है.”
सोच बदलने की ज़रूरत
नाटक में हिंदी भाषा और बोलियों में महिला जननांगों और यौन संबंधों से जुड़े कई प्रचलित शब्दों, यहां तक कि गालियों का भी इस्तेमाल हुआ है.लेकिन ये भाषा की सहजता और काव्यत्मकता ही थी कि जैसे-जैसे 'योनि' का किस्सा आगे बढ़ता गया, मेरा सारा डर और पूर्वाग्रह ख़ुद-ब-ख़ुद ख़त्म होते गए.
कायज़ाद कहते हैं, “ये एक बहुत दिलचस्प बात है कि लोग सड़क पर कोई ग़लत शब्द या गाली इस्तेमाल करते वक्त नहीं हिचकिचाते लेकिन स्टेज पर जब मेरी अभिनेत्रियां ये शब्द या गाली बोलती हैं तो लोग एकदम सकते में आ जाते हैं कि ये क्या हो रहा है.”
लेकिन अनुवादक जयदीप सरकार के मन में कभी भी भाषा के अश्लील होने का डर या दुविधा नहीं थी.
जयदीप कहते हैं, “भाषा की अश्लीलता का डर बिलकुल ग़लत है क्योंकि हमारी संस्कृति में यौन संबंधों के बारे में बिना किसी शर्म के ज़िक्र है. खजुराहो है, कामसूत्र है और कृष्ण की रासलीला में भी इसकी छाप मिलती है. बल्कि पूरी दुनिया से कहीं पहले हमारी संस्कृति ने इस बारे में खुल कर बात की है. इसलिए नाटक की भाषा का अभद्र या अश्लील होने का तो सवाल ही नहीं था.”
वे आगे कहते हैं, “इस विषय को हमने अश्लील बनाया है. आज हम सेक्स के बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे किसी गंदी चीज़ की बात कर रहे हों. इरादा अश्लील हो सकता है, मुद्दा कतई अश्लील नहीं है.”
विश्व मंच पर अपनी जगह बनाने की कोशिश करते 21वीं सदी के आधुनिक भारत में महिलाओं और बच्चियों के बलात्कार और यौन हिंसा के मामले तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं. समाज के डर और सदियों की सोच के चलते इनके बारे में बात करने में भी महिलाएं हिचकिचाती हैं, डरती हैं.
ऐसे में ज़रूरत है अपनी सोच बदलने की, एक ऐसा संवाद शुरू करने की जो ये बदलाव लाने में मदद कर सके और मानसिक और सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ सके.
और ‘किस्सा योनि का’ और ऐसी और तमाम कोशिशों ने इन वर्जनाओं को तोड़ने की शुरुआत कर दी है.

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