Tuesday, April 26, 2011

अध्याय 9 : बौद्धों का अपमान - छुआछूत का मूलाधार

१८७० से चार जनगणनाओं मे धार्मिक आधारों पर ही लोगों को वर्गीकृत किया जाता था। मगर १९१० में पहली बार नया तरीका अपनाया गया और हिन्दुओ को तीन वर्गों में बाँटा गया; १. हिन्दू, २. जनजाति या आदिवासी, ३. अछूत। हिन्दुओ के भीतर वर्गीकरण करने के लिये दस कसौटियां तय की गईं।

१. ब्राह्मणों का प्रभुत्व नहीं मानते।
२. किसी ब्राह्मण या हिन्दू गुरु से गुरु मंत्र नहीं लेते।
३. देवों को प्रमाण नहीं मानते।
४. हिन्दू देवी देवताओं को नहीं पूजते।
५. अच्छे ब्राह्मण उनका संस्कार नहीं करते।
६. उनका कोई ब्राह्मण पुरोहित नहीं होता।
७. मंदिरों के गर्भ गृह में प्रवेश नहीं पा सकते।
८. स्पर्श या पास आकर अपवित्र कर देते है।
९. अपने मुर्दों को दफ़नाते हैं।
१०. गोमांस खाते हैं।

इन में से क्रम संख्या २, ५, ६, ७, और १० अछूतों से सम्बन्धित हैं और २, ५, व ६ पर इस अध्याय में चर्चा होगी।

सभी प्रांतो के जनगणना आयुक्तों ने पाया कि अछूतों के अपने पुजारी होते हैं। चूंकि ब्राह्मण अछूतों से स्वयं को ऊँचा मानते हैं और घृणा करते हैं इसलिये ये तथ्य मिले हैं ऐसा आम तौर पर समझा गया। किंतु यदि यह कहा जाय कि अछूत भी ब्राह्मणो को अपवित्र मानते हैं तो लोगों को आश्चर्य होगा। मगर एबे दुबोय को ऐसे तथ्य मिले हैं;"

आज भी गाँव में एक पैरिया (अछूत) ब्राह्मणों की गली से नहीं गुज़र सकता। दूसरी ओर एक पैरिया एक ब्राह्मण को अपनी झोपड़ियों के बीच से नहीं गुज़रने देगा क्यों कि उनके विश्वास के अनुसार यह अपशगुन उन्हे बरबाद कर देगा।"

मैसूर के हसन ज़िले के होलेय के बारे में लिखते हैं श्री मैकेन्ज़ी, गाँव की सीमा के बाहर उन होलियरो की बस्ती है, जिनके स्पर्श मात्र से लोग अपवित्र हो जाते हैं' बावजूद इसके सत्य यह भी है कि अगर एक ब्राह्मण होलियरों की बस्ती से बिना बेइज्जत हुए गुज़र पाए तो इसे अपना सौभाग्य समझता है। क्योंकि कोई ब्राह्मण उनकी बस्ती में आए इससे होलियरों को बड़ी आपत्ति है, और इस प्रकार आने वाले ब्राह्मण को वे सब मिल कर जूतों से मारते हैं।

इस अजीबोगरीब व्यवहार की क्या व्याख्या हो सकती है? याद रखा जाय कि अछूत हमेशा अछूत नहीं थे, वे उजड़े हुए कबीलों के लोग या छितरे लोग थे। तो वो क्या वजह थी कि ब्राह्मणों ने इनके धार्मिक रीति रिवाज़ को सम्पन्न कराने से क्यों इंकार कर दिया? या कहीं ऐसा तो नहीं कि इन छितरे लोगों ने ही ब्राह्मणों को मान्यता से देने इंकार कर दिया? इस परस्पर अपवित्रता की धारणा और परस्पर घृणा का कारण क्या है?

इसका एक स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि ये छितरे लोग बौद्ध थे और इसी लिये वे ब्राह्मणों का न तो आदर करते थे और न उन्हे अपना पुरोहित बनाते थे। दूसरी ओर ब्राह्मण भी उन्हे पसन्द नहीं करते थे क्योंकि वे बौद्ध थे। अब इसका कोई प्रमाण नहीं कि वे बौद्ध थे मगर चूंकि उस वक्त अधिकाधिक लोग बौद्ध ही थे इसलिये ये माना जा सकता है कि वे बौद्ध थे। और बौद्धों के प्रति घृणा के प्रमाण मिलते हैं;नीलकंठ की पुस्तक प्रायश्चित मयूख में मनु का एक श्लोक आता है, जिसका अर्थ है-

'यदि कोई आदमी किसी बौद्ध, पाशुपत पुष्प, लोकायत, नास्तिक या किसी महापातकी का स्पर्श करेगा तो वह स्नान करके ही शुद्ध हो सकेगा'।

वृद्ध हारीत ने एक कदम आगे जाकर बौद्ध विहार में जाने को पाप घोषित किया है, जिससे मुक्त होने के लिये आदमी को स्नान करना होगा।

इस दुर्भावना का सबसे अच्छा प्रमाण मृच्छकटिक में है। नाटक का नायक चारुदत्त बौद्ध श्रमण के दर्शन मात्र को अपशगुन मानता है। और खलनायक शकार बौद्ध श्रमण को देखकर मारने की धमकी देता है और पीटता भी है। आम हिन्दू जनों की भीड़ बौद्ध श्रमण से बच बच कर चलती है। घृणा का भाव इतना प्रबल है कि जिस सड़क पर श्रमण चलता है हिन्दू उस पर चलना ही छोड़ देता है। देखें तो बौद्ध श्रमण और ब्राह्मण एक तरह से बराबर हैं। लेकिन ब्राह्मण मृत्युदण्ड और शारीरिक दण्ड से मुक्त है और बौद्ध श्रमण मारा जाता है बिना किसी प्रायश्चित या आत्मग्लानि के मानो इस में कोई बुराई ही न हो।

यह स्वीकार कर लेने में कि छितरे लोग बौद्ध थे, तमाम प्रश्नों के उत्तर हमारे लिये साफ़ हो जाते हैं। लेकिन क्या सिर्फ़ बौद्ध होना ही उनके अछूत होने के लिये पर्याप्त था? इस सवाल का सामना करेंगे हम अगले अध्याय में।

2 comments:

  1. अक्सर हम सुनते है बोद्धो ओर सनातनियो से की शंकराचार्य जी ने भारत से बोद्ध धम्म को खत्म किया | कुछ लोग इसे शास्त्रार्थ द्वारा बताते है ,लेकिन माधव शंकर दिग्विजय में राजा सुधन्वा आदि की सेना द्वारा उनका संहार करने का वर्णन है .. क्या शंकराचार्य जी की वजह से बोद्ध धम्म का नाश हुआ ..क्या शंकराचार्य जी ने हत्याये करवाई इस विषय में हम अपने विचार न रखते हुए एक महान बोद्ध पंडित राहुल सांस्कृत्यन जी की पुस्तक बुद्ध चर्या के प्रथम संस्करण १९३० की जिसका प्रकाशन गौतम बुक सेंटर दिल्ली से हुआ के अध्याय भारत में बोद्ध धम्म का उथान और पतन ,पेज न १०-११ से उधृत करते है – इसमें बोद्धो के पतन का कारण तुर्की आक्रमण कारी ओर उनका तंत्रवाद को प्रबल प्रमाणों द्वारा सिद्ध करते है
    एक ओर कहा जाता है ,शंकर ने बोद्धो को भारत से मार कर भगाया और दूसरी ओर हम उनके बाद गौड़ देश में पालवंशीय बोद्ध नरेशो का प्रचंड प्रताप फैला देखते है ,तथा उसी समय उदन्तपूरी और विक्रमशीला जेसे बोद्ध विश्वविद्यालयों को स्थापित देखते है | इसी समय बोद्धो को हम तिब्बत पर धर्म विजय करते भी देखते है | ११ वि सदी में जब कि ,उक्त दंत कथा अनुसार भारत में कोई भी बोद्ध न रहना चाहिए , तब तिब्बत से कितने ही बोद्ध भारत आते ओर वे सभी जगह बोद्ध ओर भिक्षुओ को पाते है | पाल काल के बुद्ध ,बोधिसत्व ओर तांत्रिक देवी देवताओं की गृहस्थो हजारो खंडित मुर्तिया उतरी भारत के गाँव तक में पायी जाती है | मगध ,विशेष कर गया जिले में शायद ही कोई गाँव होगा ,जिसमे इस काल की मुर्तिया न हो (गया -जिले के जहानाबाद सब डिविजन के गाँव में इन मूर्तियों की भरमार है ,केस्पा .घेजन आदि गाँव में अनेक बुद्ध ,तारा ,अवलोकितेश्वर आदि की मुर्तिया उस समय के कुटिलाक्षर में ये धर्मा हेतुप्रभवा …..श्लोक से अंकित मिलती है ) वह बतला रही है कि उस समय किसी शंकर ने बोद्ध धम्म को नस्तनाबुत नही किया था | यही बात सारे उत्तर भारत से प्राप्त ताम्र लेखो ओर शिलालेख से मालुम होती है | गौडनपति तो मुसलमानों के बिहार बंगाल विजय तक बोद्ध धर्म और कला के महान संरक्षक थे ,अंतिम काल तक उनके ताम्र पत्र बुद्ध भगवान के प्रथम धर्मोपदेश स्थान मृगदाव (सारनाथ ) के लांछन दो मृगो के बीच रखे चक्र से अलंकृत होते थे | गौड़ देश के पश्चिम में कन्याकुब्ज राज था ,जो कि यमुना से गण्डक तक फैला था | वहा के प्रजा जन और नृपति गण में भी बोद्ध धम्म का खूब सम्मान था | यह बात जयचंद के दादा गोविंदचद्र के जेतवन बिहार को दिए पांच गाँवों के दानपात्र तथा उनकी रानी कुमारदेवी के बनवाये सारनाथ के महान बौद्ध मन्दिर से मालुम होती है | गोविंद चन्द्र के बेटे जयचन्द्र की एक प्रमुख रानी बौद्धधर्मावलम्बिनी थी ,जिसके लिए लिखी गयी प्रज्ञापारमिता की पुस्तक अब भी नेपाल दरबार पुस्तकालय में मौजूद है | कन्नौज में गहडवारो के समय की कितनी ही बोद्धमुर्तिया निलती है ,जो आज किसी देवी देवता के रूप में पूजी जाती है | कालिंजर के राजाओ के समय की बनी महोबा आदि से प्राप्त सिंहनाद अवलोकितेश्वर आदि की सुंदर मुर्तिया बतला रही है कि .तुर्कों के आने के समय तक बुन्देलखंड में बोद्धो की संख्य काफी थी | दक्षिण भारत में देवगिरी के पास एलोरा के भव्य गुहा प्रसादों में भी कितनी ही बोद्ध गुहये ओर मुर्तिया .मालिक काफूर से कुछ पहले तक की बनी हुई है | यही बात नासिक के पांडववेलिनी की गुहाओ के विषय में है | क्या इससे सिद्ध नही होता कि .शंकर द्वारा बोद्ध का निर्वसन एक कल्पना मात्र है | खुद शंकर की जन्मभूमि केरल से बोद्धो का प्रसिद्ध तन्त्र मन्त्र ग्रन्थ ” मंजूष मूलकल्प संस्कृत में मिला है ,जिसे वही त्रिवेन्द्रम से स्व महामहोपाध्याय गणपतिशास्त्री जी ने प्रकाशित कराया था | क्या इस ग्रन्थ की प्राप्ति यह नही बतलाती कि ,सारे भारत से बोद्धो का निकलना तो अलग केरल से भी वह बहुत पीछे लुप्त हुए है | ऐसी बहुत सी घटनाओं ओर प्रमाण पेश किये जा सकते है जिससे इस बात का खंडन हो जाता है | राहुल जी की इस बात से न्व्बोद्धो ओर कुछ सनातनियो की इस बात का खंडन हो जाता है कि शंकराचार्य जी ने भारत से बोद्ध धम्म को नष्ट किया ..माधव दिग्विजय एक दंत कथा मात्र है | बोद्ध धम्म भारत से बोद्धो के अंधविश्वास ओर तुर्क आक्रमण कारियों के कारण नष्ट हुआ

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  2. Who where shudra book ko padne par ye clear ho jataa hai ko
    Is desh me bouddho ka patan aryo dawara kiya gya hai

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