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Friday, April 20, 2012

90 फीसदी भारतीय बेवकूफ " काटजू

नई दिल्ली अपनी ही बिरादरी पर बरसते हुए भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने कहा है कि न्यायपालिका को अपनी सीमाओं को कतई नहीं लांघना चाहिए। उसे कार्यपालिका के कामकाज में दखल देने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ जज खुद को सम्राट मानने लगे हैं। न्यूज-24 को दिए साक्षात्कार में काटजू कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को सभी नदियों को जोड़ने का आदेश दिया। मुझे समझ नहीं आया कि आखिर सुप्रीम कोर्ट कार्यपालिका को इस तरह का फरमान किस आधार पर सुना सकता है। काटजू ने कहा कि कुछ जज अपने को सम्राट मानने लगते हैं। ये सीमाओं का उल्लंघन है। उन्हें इससे बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भी लक्ष्मण रेखा को पार करता है। उसे यह नहीं करना चाहिए। पूरा देश बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कसीदे पढ़ता है, पर जस्टिस काटजू को लगता है कि वह बिहार में मीडिया को अपने पक्ष में मैनेज कर रहे हैं। वह मानते हैं कि बिहार में मीडिया पर अघोषित इमरजेंसी है, जिसके चलते कोई भी सरकार के खिलाफ लिखने का साहस नहीं करता। वहां पत्रकारों को लगता है कि अगर उनके खिलाफ कुछ लिखा गया तो नौकरी चली जाएगी या उसे ट्रांसफर करके प्रताडि़त किया जाएगा। उन्होंने मामले की छानबीन करने के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है। वह कहते हैं कि बिहार शाइनिंग के दावे खोखले हैं। वहां इंडस्ट्री कहां है? मैं हाल ही में पटना गया था। वहां सड़कों पर कूढ़े के ढेर तथा बदबू से दो चार होकर मन बहुत क्षुब्ध हुआ। काटजू मीडिया को इस बात के लिए कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ते कि वो अपने ऊपर किसी नियंत्रण के लिए राजी नहीं होता। वह बड़े ही तल्ख लहजे में कहते हैं कि जब जजों, वकीलों तथा डॉक्टरों पर नियंत्रण है, तो मीडिया को इससे परहेज क्यों है। ममता बनर्जी पर कार्टून बनाने वाले को जेल की हवा खिलाने के मामले में वह पहली बार मीडिया के हक में खड़े नजर आए। काटजू ने कहा, ममता को बच्चों की तरह आचरण करने से बचना चाहिए था। कोई आपके ऊपर कार्टून बनाए और आप उसे जेल भेज दें, यह गलत है। कार्टून पर मुस्कराना सीखना चाहिए। हालांकि मैं ममता का इस बात के लिए सम्मान करता हूं कि उनके खिलाफ आर्थिक गड़बड़ी का एक भी मामला सामने नहीं आया है। 90 फीसदी भारतीयों को बेवकूफ बताने संबंधी अपनी टिप्पणी पर वह आज भी कायम हैं। उनका कहना है कि अगर यह बात सच नहीं होती तो वे जाति के आधार पर मताधिकार का प्रयोग नहीं करते। अगर वे अपने वोट से फूलन देवी को सांसद बनवा सकते हैं, तो आप उनके बारे में खुद तय कर लीजिए कि वे कितने बेवकूफ हैं।
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-04-21&pageno=1#id=111738535933132012_49_2012-04-21

Saturday, March 31, 2012

सनी लियोन की निंदा न करें: जस्टिस काटजू

मंगलवार, 10 जनवरी, 2012 को 15:16 IST तक के समाचार
सनी लियोन
सनी लियोन को कई फ़िल्मों में काम करने का प्रस्ताव भी मिला है
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा है कि अमरीकी पॉर्न स्टार सनी लियोन के अतीत के लिए उनकी निंदा नहीं करनी चाहिए.
रियलिटी शो 'बिग बॉस' से चर्चा में आईं सनी लियोन को लेकर बहुत से लोगों ने आपत्ति जताई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज काटजू ने कहा कि सनी लियोन अमरीका में जिस तरह से कमा रही थीं वह उस देश में स्वीकार्य है हालांकि भारत में इसे स्वीकार नहीं किया जाता.
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से जारी किए गए एक बयान में उन्होंने कहा, ''अगर भारत में उनका व्यवहार सामाजिक रूप से स्वीकार्य है और यहां के नैतिक मूल्यों का उल्लंघन नहीं करता तो हमें उन्हें सामाजिक रूप से बहिष्कृत नहीं करना चाहिए.''
बयान के अनुसार सनी के बिग बॉस में शामिल होने के ख़िलाफ़ ब्रॉडकास्टर्स कंज्यूमर्स कंप्लेंट काउंसिल (बीसीसीसी) को शिकायत की गई थी. लेकिन काउंसिल ने कार्रवाई नहीं की तो शिकायत सूचना और प्रसारण मंत्रालय को की गई जिसकी एक प्रति प्रेस परिषद को भी भेजी गई थी.

'भारत में व्यवहार ठीक'

"उनके सामने ऐसा कुछ भी नहीं पेश किया गया है जिससे यह स्पष्ट होता हो कि सनी भारत में पॉर्नॉग्राफ़ी में संलग्न हैं. इसलिए हमें उनके अतीत को लेकर उनकी निंदा नहीं करना चाहिए"
जस्टिस काटजू
जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा, ''उनके सामने ऐसा कुछ भी नहीं पेश किया गया है जिससे यह स्पष्ट होता हो कि सनी भारत में पॉर्नॉग्राफ़ी में संलग्न हैं. इसलिए हमें उनके अतीत को लेकर उनकी निंदा नहीं करना चाहिए.''
उन्होंने कहा कि महात्मा बुद्ध नगर वधु आम्रपाली के साथ रहे और उनके हाथों दिया भोजन खाया. बाद में वह उनकी शिष्या बन गई थीं.
काटजू ने कहा कि इसी प्रकार से ईसा मसीह ने मैरी को अपने पांव धोने की अनुमति दी और बाद में वह उनकी अनुयायी बन गईं.
उन्होंने कहा, ''हर संत-महात्मा का एक अतीत होता है और हर पापी का एक भविष्य होता है.''
काटजू ने कहा, "भारतीय खुले विचारों के और उदारवादी होते हैं और हमें इस मामले को उसी स्वभाव से ही लेना चाहिए."
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/01/120110_justice_leone_ac.shtml

Tuesday, February 28, 2012

सुना है कि बिहार में प्रेस की आजादी बंधक है, क्‍या ये सच है?

25 February 2012 3 Comments
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पटना विश्वविद्यालय के व्हीलर सीनेट हॉल का माहौल जस्टिस काटजू की खरी खरी टिप्पणियों से देर तक गर्माया रहा।
पटना कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर लालकेश्वर प्रसाद ने काटजू के बयान पर आपत्ति जतायी।

सभागार में मौजूद लोगों ने काटजू से अपना भाषण जारी रखने का अनुरोध किया।
♦ मणिकांत ठाकुर
भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा है कि बिहार में सत्ता पक्ष द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता के विरुद्ध रवैया अपनाने की शिकायतें मिल रही हैं।
पटना विश्वविद्यालय के एक समारोह में एक विशेष व्याख्यान में उन्होंने ये भी कहा कि ऐसी शिकायतों की जांच करायी जाएगी और मामला सही पाया गया, तो संविधान के खिलाफ काम करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
जस्टिस काटजू ने कहा, ‘बिहार के बारे में कुछ कहना चाहूंगा। मैंने सुना है कि लालू राज की तुलना में इस सरकार ने कानून व्यवस्था को सुधारा है। पर दूसरी बात मैंने ये भी सुनी है कि लालू के राज में फ्रीडम ऑफ प्रेस होती थी, लेकिन अब यहां फ्रीडम ऑफ प्रेस नहीं है।’
उन्होंने कहा, ‘सुना है कि परोक्ष रूप में ये हो रहा है कि अगर किसी पत्रकार ने सरकार के मंत्री या अधिकारी के खिलाफ कुछ लिख-बोल दिया, तो फिर आपकी नौकरी गयी या अखबार मालिक आपका पटना से बाहर कहीं तबादला कर देगा।’
मच गया हंगामा
जस्टिस काटजू के इस बयान पर आपत्ति जाहिर करने के लिए पटना कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर लालकेश्वर प्रसाद ने जोर से चिल्लाकर कहा कि ये गलत है।
वे कुछ और भी बोलने लगे कि इतने में पूरे सभागार में हंगामा मच गया। सारे लोग लालकेश्वर प्रसाद पर ये कहते हुए टूट पड़े कि ये सरकार के दलाल हैं।
दरअसल प्रसाद की पत्नी उषा सिन्हा जनता दल यूनाइटेड की विधायक हैं। ये दोनों ही मुख्यमंत्री के गृह जिले नालंदा के रहने वाले हैं और उनके स्वजातीय भी हैं।
अपने भाषण के बीच में हुई इस रुकावट से बेहद नाराज जस्टिस काटजू ने कहना शुरु किया, ‘ये क्या तरीका है, किसी को शोर मचाकर हड़काना। आप मुझे हड़का नहीं सकते हैं। गलत आदमी से आपने पंगा ले लिया है।’
उन्होंने कहा, ‘ये तो आप सिद्ध कर रहे हैं कि मैं जो कह रहा हूं, बिल्कुल सही है। कई तरीके हो सकते हैं दबाव के, जैसे सरकारी विज्ञापन बंद कर दो और अखबार मालिक पर दबाव डालो कि सरकार के खिलाफ लिखने वाले पत्रकार को निकाल दिया जाए।’
‘बिल्कुल सही कहा’
इसके बाद सभागार में मौजूद अधिकांश लोग काटजू के पास जाकर अनुरोध करने लगे कि आपने जो कहा है, बिल्कुल सही है। बिहार में प्रेस की आजादी खतरे में है, इसलिए आप अपना भाषण जारी रखें।
पटना विश्वविद्यालय के व्हीलर सीनेट हॉल का माहौल देर तक गर्माया रहा और जस्टिस काटजू ने और भी कई मसलों पर खरी-खरी टिप्पणियां की।
उन्होंने कहा कि भारत के नब्बे प्रतिशत लोग पिछड़ी मानसिकता के हैं, क्योंकि जातिवाद और अंधविश्वास उनमें भरा हुआ है।
उन्होंने ये भी कहा कि टीवी चैनलों से लेकर सिनेमा तक सभी इसी प्रयास में लगे रहते हैं कि लोगों को अपनी मूल समस्या के बारे में सोचने और उस पर प्रतिक्रिया करने का अवसर ही न मिले।
उन्होंने कहा कि गरीब लोग अपने खिलाफ हो रहे आपराधिक अन्याय के खिलाफ बगावत न कर दें, इसका पूरा प्रयास होता रहता है।

Thursday, January 12, 2012

Too little democracy in India: Katju

NEW DELHI: Disagreeing with the view that democracy is not good for the country, Press Council of India Chairperson Justice Markandey Katju today said there is in fact too little democracy in India.
"...the problem in India is not that there is too much democracy but too little. We need more democracy, not less, and that means educating those masses, raising their cultural level, and involving them actively in the task of national reconstruction," an official statement quoting him said.
Speaking at an international conference on 'science Communication for scientific temper' here, he said democracy, science, livelihood and unity should be the guiding principles to solve problems confronting the country.
Noting that democracy and science should go hand in hand, he said scientific growth requires certain supportive values like freedom to think, to criticise and to dissent, tolerance, plurality, and free flow of information.
"These precisely are the values of a democratic society," he said.
Referring to grinding poverty of the country, unemployment, inflation, level of healthcare, education and farmers' suicides, Justice Katju said the country "must aim to abolish these evils and make our country highly prosperous for all our citizens".
Holding that economic growth in India has benefited only a handful of people, he said "unless this trend is stopped, it will be disastrous for the country."
http://articles.economictimes.indiatimes.com/2012-01-10/news/30611865_1_democracy-supportive-values-chairperson-justice-markandey-katju

Justice Katju slams media for priority given to Dev Anand's death

Press Council Chairman Justice Markandey Katju, who has stirred a hornet's nest with his critical comments about the media, on Tuesday attacked the prominence given to the coverage of actor Dev Anand's death.
Putting the news of an actor's death on the front page when farmers were committing suicide and there were more pressing social and economic issues to be addressed only showed a "lack of sense of priority", he said.
"I had also watched his films when I was young and also liked them," the former Supreme Court judge said disapproving the wide prominence given to the news of the actor's death.
Katju said that 2.5 lakh farmers had committed suicide in the last fifty years but barring some exceptions and journalists like P Sainath, who were doing commendable work, most of the media was simply ignoring these issues.


http://indiatoday.intoday.in/story/justice-katju-slams-media-dev-anand-death-coverage/1/163099.html

Thursday, December 22, 2011

क्रिकेटरों, फिल्मी सितारों को भारत रत्न देना सम्मान का मजाक: काटजू


प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू का कहना है कि क्रिकेटरों और फिल्मी हस्तियों को भारत रत्न नहीं मिलना चाहिए.
जहां देश के करोड़ों लोग चाहते हैं कि क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर और भारत रत्न हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न मिले वहीं न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ऐसा नहीं मानते हैं.
काटजू ने कहा कि खिलाड़ियों और फिल्मी हस्तियों को भारत रत्न देना इस सम्मान का मजाक उड़ाना होगा और इससे इस पुरस्कार की गरिमा कम होगी क्योंकि इन लोगों का कोई सामाजिक सरोकार नहीं होता.
उन्होंने कहा, "लोग क्रिकेटर और फिल्म कलाकारों को भारत रत्न देने के बारे में बात कर रहे हैं. यह हमारे गिरे हुए सांस्कृतिक स्तर को दर्शाता है."
काटजू ने कहा, "हम असली नायकों को नजरअंदाज़ कर देते हैं और बनावटी लोगों की वाहवाही करते हैं. आज देश ऐसे चौराहे पर खड़ा जहां ऐसे लोगों की जरूरत है, जो देश को सही दिशा दे सकें. ऐसे ही लोगों को भारत रत्न दिया जाना चाहिए, भले ही वह आज हमारे बीच न हों." 
उल्लेखनीय है कि हाल ही में सरकार ने भारत रत्न देने से जुड़े नियमों में संशोधन की सिफारिश की गई है, जिसके बाद खेल समेत कई दूसरे क्षेत्र की हस्तियों को भारत रत्न देने का रास्ता साफ होता नज़र आ रहा है.
उम्मीद जाहिर की जा रही है कि जल्दी ही सचिन तेंदुलकर और मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न से नवाज़ा जा सकता है.
http://www.samaylive.com/nation-news-in-hindi/136693/markandey-katju-bharat-ratna-cricketers-mockery-of-award.html