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Friday, January 25, 2013

पत्नी के साथ रिश्तों में नाकाम रहे आइंस्टाइन

http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2012/04/120425_einstein_lovelife_pp.shtml
 बुधवार, 25 अप्रैल, 2012 को 17:08 IST तक के समाचार

आइंस्टाइन
आइंस्टाइन पर किताब लिखी हैं वॉल्टर इसाकसन
अगर दुनिया के चंद सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों की बात करें, तो आज भी उनमें अल्बर्ट आइंस्टाइन का नाम शुमार होता है.
भौतिकशास्त्र के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक माने जाने वाले आइंस्टाइन की निजी जिंदगी उतनी बेहतर नहीं थी.
ये दावा है लेखक वॉल्टर इसाकसन का, जिन्होंने अपने किताब आइंस्टाइन: हिज लाइफ एंड यूनिवर्स में लिखा है कि दुनिया के मशहूर वैज्ञानिक को अपनी निजी जिंदगी सफल बनाने के लिए काफी कोशिशें करनी पड़ी, लेकिन ये उनके लिए असंभव रहा.
वॉल्टर इसाकसन ने लिखा है कि कैसे आइंस्टाइन ने अपने दाम्पत्य जीवन को बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन उनके लिए ये ऐसी जंग साबित हुई, जिसे वे जीत नहीं पाए.
वास्तव में प्रेम के प्रति आइंस्टाइन का रुख इतना हस्तक्षेप करने वाला था कि जब उन्होंने देखा कि वैज्ञानिक मिलेवा मैरिक के साथ उनका वैवाहिक जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है, तो उन्होंने कुछ कड़े नियमों की एक सूची जारी कर दी.
उन्हें उम्मीद थी कि शायद इससे बच्चों की खातिर दोनों साथ रह पाएँगे.

आइंस्टाइन की सूची

ब्रितानी अखबार डेली मेल ने वॉल्टर इसाकसन की किताब के आधार पर ये सूची छापी है. ये ऐसी मांगों की सूची थी, जिससे मैरिक एक प्रेमिका के बजाए नौकरानी बन जातीं.
किताब के मुताबिक वर्ष 1914 में आइंस्टाइन ये सूची लिखने पर विवश हुए थे. उस समय उन्हें ये अहसास हो रहा था कि उनकी पहली पत्नी मैरिक के साथ उनका वैवाहिक जीवन नाकाम हो जाएगा.
मैरिक यूरोप की उन चंद महिलाओं में से थी, जिन्होंने गणित और भौतिकशास्त्र की पढ़ाई की थी. आइंस्टाइन ने ये भी प्रस्ताव रखा था कि दोनों पति-पत्नी को बच्चों की खातिर एक साथ रहना चाहिए.
लेकिन उनकी सूची चकित करने वाली थी. उन्होंने यहाँ तक मांग की थी कि उन्हें अपने पति के लिए नौकरानी की तरह काम करना चाहिए और बदले में ये उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए उन्हें प्यार मिलेगा या पतिदेव उनपर ध्यान देंगे.
दुनिया के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने मांग की थी कि मैरिक उनके कमरे को साफ-सुथरा रखें, उनके लिए तीन समय का खाना तैयार करें, जो वे अपने कमरे में खाएँगे, वे उनके कपड़े की धोएँ और उन्हें ठीक से रखें.
यही नहीं आइंस्टाइन ये भी चाहते थे कि उनकी बीवी उनका बेडरुम और अध्ययन कक्ष भी साफ-सुथरा रखें और हाँ, उनकी पत्नी को उनका डेस्क इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं थी.
आइंस्टाइन की मांग यही नहीं खत्म होती. मशहूर भौतिकशास्त्री बदले में पत्नी को ये भी समझाते हैं कि वे उनसे ज्यादा अपेक्षा न करें.

दावा

इस सूची के मुताबिक आइंस्टाइन का कहना था कि उनकी पत्नी ये उम्मीद न करें कि वे उनके साथ बैठेंगे या उनके साथ घर से बाहर जाएँगे. और तो और आइंस्टाइन ये भी चाहते थे कि वे जब भी अनुरोध करें, उनकी पत्नी बोलना बंद कर दें.
यहाँ तक कि आइंस्टाइन ये भी चाहते थे कि कहने पर उनकी पत्नी बिना किसी विरोध के उनका बेडरुम या अध्ययन कक्ष से तुरंत निकल जाएँ.
ऐसा प्रतीत होता है कि आइंस्टाइन की पत्नी ने शुरू में उनकी मांगों से सहमति जताई, लेकिन वही हुआ जिसका अंदेशा था.
कुछ ही महीनों बाद मैरिक ने आइंस्टाइन को बर्लिन में छोड़ दिया और अपने बेटों के साथ ज्यूरिख आकर रहने लगी. पाँच साल बाद यानी 1919 में उन्होंने तलाक के लिए आवेदन किया और इसे मंजूरी भी मिल गई.
आइंस्टाइन के बारे में ये भी कहा जाता है कि उनकी कई गर्ल फ्रेंड्स थीं और वर्ष 1912 से ही इलसा नाम की महिला के साथ उनके करीबी संबंध थे. हालाँकि उस समय वे शादीशुदा थे.
उन्होंने तलाक के बाद वर्ष 1919 में इलसा से शादी की. लेकिन एक बार फिर अपनी सेक्रेटरी बेटी न्यूमैन के साथ उनके करीबी रिश्ते बने.

पत्नी के साथ शारीरिक संबंध नहीं रखते थे आइंस्टीन!

आजतक ब्यूरो/आईएएनएस | लंदन, 1 मई 2012 | अपडेटेड: 09:30 IST
भौतिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी खोज करने वाले महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपनी पत्नी पर कई तरह के क्रूर प्रतिबंध लगा रखे थे. एक पुस्तक के माध्यम से यह खुलासा हुआ है. समाचार पत्र 'द सन' के मुताबिक पुस्तक में लिखा है कि आइंस्टीन अपनी पत्नी मिलेवा मारिक के साथ शारीरिक संबंध भी नहीं रखते थे। और तो और उन्होंने अपनी पत्नी पर उनके साथ बातचीत करने पर भी प्रतिबंध लगा रखा था.
आइंस्टीन ने अपनी पत्नी से कहा था कि उनके लिए शारीरिक संबंध नगण्य चीज है. वह कहते थे, 'तुम मेरे साथ शारीरिक संबंध की अपेक्षा मत करना.'
पुस्तक आइंस्टीन: हिज लाइफ एंड यूनिवर्स में लिखा है कि आइंस्टीन की पत्नी ने इसके बावजूद उनका पूरा ख्याल रखा, उनके कपड़े साफ किए और उन्हें तीनों वक्त का भोजन उपलब्ध कराया.
आइंस्टीन और उनकी पत्नी अपने बच्चों-हैंस और एडवर्ड की खातिर एक साथ रह रहे थे. दोनों की शादी 1914 में हुई थी.

http://aajtak.intoday.in/story/Albert-Einstein-starved-his-wife-of-sex-1-696728.html

Wednesday, June 27, 2012

मुझे कोई समझाए कि ये दुनिया आखिर भगवान ने कैसे बनाई : आइंस्टीन


रविवार, 19 सितम्बर 2010

मुझे कोई समझाए कि ये दुनिया आखिर भगवान ने कैसे बनाई : आइंस्टीन

मैं ये जानना चाहता हूं कि ये दुनिया आखिर भगवान ने कैसे बनाई। मेरी रुचि किसी इस या उस धार्मिक ग्रंथ में लिखी बातों पर आधारित किसी ऐसी या वैसी अदभुत और चमत्कारिक घटनाओं को समझने में नहीं है। मैं भगवान के विचार समझना चाहता हूं (1)। किसी व्यक्तिगत भगवान का आइडिया एक एंथ्रोपोलॉजिकल कॉन्सेप्ट है, जिसे मैं गंभीरता से नहीं लेता (2)। अगर लोग केवल इसलिए भद्र हैं, क्योंकि वो सजा से डरते हैं, और उन्हें अपनी भलाई के बदले किसी दैवी ईनाम की उम्मीद है, तो ये जानकर मुझे बेहद निराशा होगी कि मानव सभ्यता में दुनियाभर के धर्मों का बस यही योगदान रहा है।
मैं ऐसे किसी व्यक्तिगत ईश्वर की कल्पना भी नहीं कर पाता तो किसी व्यक्ति के जीवन और उसके रोजमर्रा के कामकाज को निर्देशित करता हो, या फिर वो, जो सुप्रीम न्यायाधीश की तरह किसी स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हो और अपने ही हाथों रचे गए प्राणियों के बारे में फैसले लेता हो। मैं ऐसा इस सच्चाई के बावजूद नहीं कर पाता कि आधुनिक विज्ञान के कार्य-कारण के मशीनी सिद्धांत को काफी हद तक शक का फायदा मिला हुआ है ( आइंस्टीन यहां क्वांटम मैकेनिक्स और ढहते नियतिवाद के बारे में कह रहे हैं)। मेरी धार्मिकता, उस अनंत उत्साह की विनम्र प्रशंसा में है, जो हमारी कमजोर और क्षणभंगुर समझ के बावजूद थोड़ा-बहुत हम सबमें मौजूद है। नैतिकता सर्वोच्च प्राथमिकता की चीज है...लेकिन केवल हमारे लिए, भगवान के लिए नहीं (3)। 
ऐसी कोई चीज ईश्वर कैसे हो सकती है, जो अपनी ही रचना को पुरस्कृत करे या फिर उसके विनाश पर उतारू हो जाए। मैं ऐसे ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता जिसके उद्देश्य में हम अपनी कामनाओं के प्रतिरूप तलाशते हैं, संक्षेप में ईश्वर कुछ और नहीं, बल्कि छुद्र मानवीय इच्छाओं का ही प्रतिबिंब है। मैं ये भी नहीं मानता कि कोई अपने शरीर की मृत्यु के बाद भी बचा रहता है, हालांकि दूसरों के प्रति नफरत जताने वाले कुछ गर्व से भरे डरावने धार्मिक विचार आत्माओं के वजूद को साबित करने में पूरी ताकत लगा देते हैं(4)।

मैं ऐसे ईश्वर को तवज्जो नहीं दे सकता जो हम मानवों जैसी ही अनुभूतियों और क्रोध-अहंकार-नफरत जैसी तमाम बुराइयों से भरा हो। मैं आत्मा के विचार को कभी नहीं मान सकता और न ही मैं ये मानना चाहूंगा कि अपनी भौतिक मृत्यु को बाद भी कोई वजूद में है। कोई अपने वाहियात अभिमान या किसी धार्मिक डर की वजह से अगर ऐसा नहीं मानना चाहता, तो न माने। मैं तो मानवीय चेतना, जीवन के चिरंतन रहस्य और वर्तमान विश्व जैसा भी है, उसकी विविधता और संरचना से ही खुश  हूं। ये सृष्टि एक मिलीजुली कोशिश का नतीजा है, सूक्ष्म से सूक्ष्म कण ने भी नियमबद्ध होकर बेहद तार्किक ढंग से एकसाथ सम्मिलित होकर इस अनंत सृष्टि को रचने में अपना पुरजोर योगदान दिया है। ये दुनिया-ये ब्रह्मांड इसी मिलीजुली कोशिश और कुछ प्राकृतिक नियमों का उदघोष भर है, जिसे आप हर दिन अपने आस-पास बिल्कुल साफ देख और छूकर महसूस कर सकते हैं (5)।
वैज्ञानिक शोध इस विचार पर आधारित होते हैं कि हमारे आस-पास और इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी घटता है उसके लिए प्रकृति के नियम ही जिम्मेदार होते हैं। यहां तक कि हमारे क्रियाकलाप भी इन्हीं नियमों से तय होते हैं। इसलिए, एक रिसर्च साइंटिस्ट शायद ही कभी ये यकीन करने को तैयार हो कि हमारे आस-पास की रोजमर्रा की जिंदगी में घटने वाली घटनाएं किसी प्रार्थना या फिर किसी सर्वशक्तिमान की इच्छा से प्रभावित होती हैं (6)।
सच्चाई तो ये है कि मेरे धार्मिक विश्वासों के बारे में आप जो कुछ भी पढ़ते हैं, वो एक झूठ के अलावा कुछ और नहीं। एक ऐसा झूठ जिसे बार-बार योजनाबद्ध तरीके से दोहराया जाता है। मैं दुनिया के किसी पंथ या समूह के व्यक्तिगत ईश्वर पर विश्वास नहीं करता और मैंने कभी इससे इनकार नहीं किया, बल्कि हर बार और भी जोरदार तरीके से इसकी घोषणा की है। अगर मुझमें धार्मिकता का कोई भी अंश है, तो वो इस दुनिया के लिए असीमित प्रेम और सम्मान है, जिसके कुछ रहस्यों को विज्ञान अब तक समझने में सफल रहा है (7)।
कॉस्मिक रिलिजन का ये एहसास किसी ऐसे व्यक्ति को करवाना बेहद मुश्किल है जो दुनियावी धर्मों के दलदल में गले तक धंसा हो और जो पीढ़ियों पुराने अपने धार्मिक विश्वास को छोड़, कुछ और सुनने तक को तैयार न हो। ऐसी ही धार्मिक अडिगता, हर युग के शिखर धर्म-पुरुषों की पहचान रही है, जिनके विश्वास तर्क आधारित नहीं होते, वो अपने आस-पास घटने वाली घटनाओं के लिए कारण नहीं तलाशते, यहां तक कि कई धर्म-नेताओं को तो ऐसा भगवान भी स्वीकार्य नहीं होता जिसका आकार मानव जैसा हो। हम सब प्रकृति की संतानें हैं, जिनका जन्म प्रकृति के ही कुछ नियमों के तहत हुआ है, लेकिन अब हम प्रकृति के उन नियमों को ही अपना ईमान नहीं बनाना चाहते। कोई भी चर्च ऐसा नहीं है, जिनके आधारभूत उपदेशों में इन नियमों की बात की गई हो। मेरे विचार से इस सृष्टि को रचने वाले प्राकृतिक नियमों के प्रति लोगों में सम्मान की भावना उत्पन्न करना और इसे आने वाली पीढ़ियों तक प्रसारित करना ही कला और विज्ञान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है (8)।
मैं एक पैटर्न देखता हूं तो उसकी खूबसूरती में खो जाता हूं, मैं उस पैटर्न के रचयिता की तस्वीर की कल्पना नहीं कर सकता। इसी तरह रोज ये जानने के लिए मैं अपनी घड़ी देखता हूं कि, इस वक्त क्या बजा है? लेकिन रोज ऐसा करने के दौरान एक बार भी मेरा ख्यालों में उस घड़ीसाज की तस्वीर नहीं उभरती जिसने फैक्ट्री में मेरी घड़ी बनाई होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि मानव मस्तिष्क फोर डायमेंशन्स ( चार विमाएं – लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई या गहराई और समय) को एकसाथ समझने में सक्षम नहीं है, इसलिए वो भगवान का अनुभव कैसे कर सकता है, जिसके समक्ष हजारों साल और हजारों डायमेंशन्स एक में सिमट जाते हैं (9)। इतनी तरक्की और इतने आधुनिक ज्ञान के बाद भी हम ब्रह्मांड के बारे में कुछ भी नहीं जानते। मानव विकासवाद की शुरुआत से लेकर अब तक अर्जित हमारा सारा ज्ञान किसी स्कूल के बच्चे जैसा ही है। संभवत: भविष्य में इसमें कुछ और इजाफा हो, हम कई नई बातें जान जाएं, लेकिन फिर भी चीजों की असली प्रकृति, कुछ ऐसा रहस्य है, जिसे हम शायद कभी नहीं जान सकेंगे, कभी नहीं (10)।
मैं बार-बार कहता रहा हूं कि मेरे विचार से व्यक्तिगत ईश्वर की अवधारणा बिल्कुल बचकानी है। लेकिन मैं व्यावसायिक नास्तिकों के उस दिग्विजयकारी उत्साह में भागीदारी नहीं करना चाहता जो अपनी बात मनवाने के जुनून में भरकर नौजवानो से उनके धार्मिक विश्वासों को छुड़वाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। बल्कि, प्रकृति को समझने में अपनी बौद्धिक और मानवीय कमियों के साथ मैं विनम्रता भरे व्यवहार को प्राथमिकता दूंगा।
भविष्य का धर्म एक कॉस्मिक रिलिजन होगा। ये दुनियाभर के व्यक्तिगत भगवानों की जगह ले लेगा और बिना तर्क के धार्मिक विश्वासों और तमाम धार्मिक क्रिया-कलापों, कर्म-कांडों को बेमानी कर देगा। ये प्राकृतिक भी होगा और आध्यात्मिक भी, ये उन अनुभवों से बने तर्कों पर आधारित होगा कि सभी प्राकृतिक और आध्यात्मिक चीजें इस तरह एक हैं जिनका समझा जा सकने वाला एक अर्थ है। ये जो कुछ भी मैं कह रहा हूं, इसका जवाब बौद्ध धर्म में है। अगर कोई ऐसा धर्म है जो भविष्य में  आधुनिक वैज्ञानिक जरूरतों के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकता है, तो वो बौद्ध धर्म ही होगा।
- अल्बर्ट आइंस्टीन   
References -
(1) (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, 2000 p.202)
(2) (Albert Einstein, Letter to Hoffman and Dukas, 1946)
(3) (Albert Einstein,The Human Side, edited by Helen Dukas and Banesh Hoffman, Princeton University Press)
(4) (Albert Einstein, Obituary in New York Times, 19 April 1955)
(5) (Albert Einstein, The World as I See It)
(6) (Albert Einstein, 1936, The Human Side. Responding to a child who wrote and asked if scientists pray.)
(7) (Albert Einstein, 1954, The Human Side, edited by Helen Dukas and Banesh Hoffman, Princeton University Press)
(8)  (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, p. 207)
(9) (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, 2000 p. 208)
(

Saturday, June 9, 2012

Was Einstein a slow learner as a child?



Einstein was slow in learning how to speak. His parents even consulted a doctor. He also had a cheeky rebelliousness toward authority, which led one headmaster to expel him and another to amuse history by saying that he would never amount to much. But these traits helped make him a genius. His cocky contempt for authority led him to question conventional wisdom. His slow verbal development made him curious about ordinary things – such as space and time – that most adults take for granted. His father gave him a compass at age five, and he puzzled over the nature of a magnetic field for the rest of his life. And he tended to think in pictures rather than words.

Was Einstein learning disabled?

Some researchers claim to detect in Einstein’s childhood a mild manifestation of autism or Asperger’s syndrome. Simon Baron-Cohen, the director of the autism research center at Cambridge University, is among those. He writes that autism is associated with a “particularly intense drive to systemize and an unusually low drive to empathize.” He also notes that this pattern “explains the ‘islets of ability’ that people with autism display in subjects like math or music or drawing -- all skills that benefit from systemizing.”* I do not find such a long-distance diagnosis to be convincing. Even as a teenager, Einstein made close friends, had passionate relationships, enjoyed collegial discussions, communicated well verbally and could empathize with friends and humanity in general.

Did Einstein flunk math?

One widely held belief about Einstein is that he failed math as a student, an assertion that is made, often accompanied by the phrase “as everyone knows,” by scores of books and thousands of websites designed to reassure underachieving students. A Google search of Einstein failed math turns up more than 500,000 references. The allegation even made it into the famous “Ripley’s Believe it or Not!” newspaper column.
Alas, Einstein’s childhood offers history many savory ironies, but this is not one of them. In 1935, a rabbi in Princeton showed him a clipping of the Ripley’s column with the headline “Greatest living mathematician failed in mathematics.” Einstein laughed. “I never failed in mathematics,” he replied, correctly. “Before I was fifteen I had mastered differential and integral calculus.” In primary school, he was at the top of his class and “far above the school requirements” in math. By age 12, his sister recalled, “he already had a predilection for solving complicated problems in applied arithmetic,” and he decided to see if he could jump ahead by learning geometry and algebra on his own. His parents bought him the textbooks in advance so that he could master them over summer vacation. Not only did he learn the proofs in the books, he also tackled the new theories by trying to prove them on his own. He even came up on his own with a way to prove the Pythagorean theory.

Did Einstein think in pictures rather than words?

Yes, his great breakthroughs came from visual experiments performed in his head rather than the lab. They were calledGedankenexperiment -- thought experiments. At age 16, he tried to picture in his mind what it would be like to ride alongside a light beam. If you reached the speed of light, wouldn’t the light waves seem stationery to you? But Maxwell’s famous equations describing electromagnetic waves didn’t allow that. He knew that math was the language nature uses to describe her wonders, so he could visualize how equations were reflected in realities. So for the next ten years he wrestled with this thought experiment until he came up with the special theory of relativity.

What thought picture did Einstein use for special relativity?

Among other things, he pictured lightning striking at both ends of a moving train. A person on the embankment might see the strikes as simultaneous, but to someone on the speeding train they would appear to have happened at different moments. Because the train is speeding forward, the light from the strike at the front of the train would reach him a moment before the light from the strike at the back of the train. From that he realized that simultaneity is relative to your state of motion, and from that he came up with the idea that there is no such thing asabsolute time. Time is relative. Hence the special theory of relativity.