Monday, April 25, 2011

हिंदू गोमांस खाते थे ?





हाभारत में रंतिदेव नामक एक राजा का वर्णन मिलता है जो गोमांस परोसने के कारण यशवी बना. महाभारत, वन पर्व (अ. 208 अथवा अ.199) में आता है 
राज्ञो महानसे पूर्व रन्तिदेवस्‍य वै द्विज
द्वे सहस्रे तु वध्‍येते पशूनामन्‍वहं तदा
अहन्‍यहनि वध्‍येते द्वे सहस्रे गवां तथा
समांसं ददतो ह्रान्नं रन्तिदेवस्‍य नित्‍यशः
अतुला कीर्तिरभवन्‍नृप्‍स्‍य द्विजसत्तम ---- महाभारत, वनपर्व 208 199/8-10

अर्थात राजा रंतिदेव की रसोई के लिए दो हजार पशु काटे जाते थे. प्रतिदिन दो हजार गौएं काटी जाती थीं मांस सहित अन्‍न का दान करने के कारण राजा रंतिदेव की अतुलनीय कीर्ति हुई. इस वर्णन को पढ कर कोई भी व्‍यक्ति समझ सकता है कि गोमांस दान करने से यदि राजा रंतिदेव की कीर्ति फैली तो इस का अर्थ है कि तब गोवध सराहनीय कार्य था, न कि आज की तरह निंदनीय


महाभारत में गौगव्‍येन दत्तं श्राद्धे तु संवत्‍सरमिहोच्यते --
अनुशासन पर्व, 88/5
अर्थात गौ के मांस से श्राद्ध करने पर पितरों की एक साल के लिए तृप्ति होती है



पंडित पांडुरंग वामन काणे ने लिखा है
''ऐसा नहीं था कि वैदिक समय में गौ पवित्र नहीं थी,
उसकी 'पवित्रता के ही कारण वाजसनेयी संहिता (अर्थात यजूर्वेद) में यह व्यवस्‍था दी गई है कि गोमांस खाना चाहिए''
--धर्मशास्‍त्र विचार, मराठी, पृ 180)


मनुस्मृति में
उष्‍ट्रवर्जिता एकतो दतो गोव्‍यजमृगा भक्ष्‍याः ---
मनुस्मृति 5/18 मेधातिथि भाष्‍यऊँट को छोडकर एक ओर दांवालों में गाय, भेड, बकरी और मृग भक्ष्‍य अर्थात खाने योग्‍य है



रंतिदेव का उल्‍लेख महाभारत में अन्‍यत्र भी आता है.
शांति पर्व, अध्‍याय 29, श्‍लोक 123 में आता है
कि राजा रंतिदेव ने गौओं की जा खालें उतारीं, उन से रक्‍त चूचू कर एक महानदी बह निकली थी. वह नदी चर्मण्‍वती (चंचल) कहलाई.
महानदी चर्मराशेरूत्‍क्‍लेदात् संसृजे यतः
ततश्‍चर्मण्‍वतीत्‍येवं विख्‍याता सा महानदी

कुछ लो इस सीधे सादे श्‍लोक का अर्थ बदलने से भी बाज नहीं आते. वे इस का अर्थ यह कहते हैं कि चर्मण्‍वती नदी जीवित गौओं के चमडे पर दान के समय छिडके गए पानी की बूंदों से बह निकली.
इस कपोलकप्ति अर्थ को शाद कोई स्‍वीकार कर ही लेता यदि कालिदास का 'मेघदूत' नामक प्रसिद्ध खंडकाव्‍य पास न होता. 'मेघदूत' में कालिदास ने एक जग लिखा है

व्‍यालंबेथाः सुरभितनयालम्‍भजां मानयिष्‍यन्
स्रोतोमूर्त्‍या भुवि परिणतां रंतिदेवस्‍य कीर्तिम

यह पद्य पूर्वमेघ में आता है. विभिन्‍न संस्‍करणों में इस की संख्‍या 45 या 48 या 49 है.
इस का अर्थ हैः ''हे मेघ, तुम गौओं के आलंभन (कत्‍ल) से धरती पर नदी के रूप में बह निकली राजा रंतिदेव की कीर्ति पर अवश्‍य झुकना.''

सिर्फ साम्प्रदायिकता फैलाने के लिए अब गाये का इस्तेमाल करते हैं
इनका कहना है
गाये हमारी माता है
हमको कुछ नहीं आता है
बैल हमारा बाप है
प्रेम से रहना पाप है
ये जरमन और युरशियन लोग आज अपनी माँ को तो पूछते नहीं ,, मानव को मानव नहीं समझते मगर गए का मूत पीने को तैयार रहते हैं

14 comments:

  1. HINDU KABHI MANS KHATE HI NAHI THE UPAR JO SHLOK LIKHE GAYE HAI VAH AASURI PRAVRITTI KE AASURO NE DALE GAYE HAI,......

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    1. http://bit.ly/wYQyET

      Dear must read this link

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    2. अष्टाशीतितमो (88) अध्याय :अनुशासनपर्व (दानधर्म पर्व)

      महाभारत: अनुशासनपर्व: अष्टाशीतितमो अध्याय: श्लोक 1-10 का हिन्दी अनुवाद
      श्राद्ध में पितरों के तृप्तिविषय का वर्णन
      युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह ! पितरों के लिये दी हुई कौन-सी वस्तु अक्षय होती है? किस वस्तु के दान से पितर अधिक दिन तक और किसके दान से अनन्त काल तक तृप्त रहते हैं। भीष्मजी ने कहा- युधिष्ठिर ! श्राद्धवेत्ताओं ने श्राद्ध-कल्पमय जो हविष्य नियत किये हैं, वे सब-के-सब काम्य हैं। मैं उनका तथा उनके फल का वर्णन करता हूं, सुनो। नरेश्‍वर ! तिल, ब्रीहि, जौ, उड़द, जल और फल-मूल के द्वारा श्राद्ध करने से पितरों को एक मास तक तृप्ति बनी रहती है । मनुजी का कथन है कि जिस श्राद्ध में तिल की मात्रा अधिक रहती है, वह श्राद्ध अक्षय होता है। श्राद्ध सम्बन्धी सम्पूर्ण भोज्य पदार्थों में तिलों का प्रधान रूप से उपयोग बताया गया है। यदि श्राद्ध में गाय का दही दान किया जाये तो उससे पितरों को एक वर्ष तक तृप्ति होती बतायी गयी है। गाय के दही का जैसा फल बताया गया है, वैसा ही घृत मिश्रित खीर का भी समझना चाहिये । युधिष्ठिर ! इस विषय में पितरों द्वारा गाई हुई गाथा का भी विज्ञ पुरुष गान करते हैं। पूर्वकाल में भगवान सनत्कुमार ने मुझे यह गाथा बतायी थी । पितर कहते हैं- ‘क्या हमारे कुल में कोई ऐसा पुरुष उत्पन्न होगा, जो दक्षिणायन में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में मघा और त्रियोदशी तिथी का योग होने पर हमारे लिये घृत मिश्रित खीर का दान करेगा?' ‘अथवा वह नियमपूर्वक व्रत का पालन करके मघा नक्षत्र में ही हाथी के शरीर की छाया में बैठकर उसके कान रूपी व्यजन से हवा लेता हुआ अन्न-विशेष चावल का बना हुआ पायश लोहषाक से विधि पूर्वक हमारा श्राद्ध करेगा ?' ‘पितरों की क्षय-तिथी को जल, मूल, फल उसका गूदा और अन्न आदि जो कुछ भी मधु मिश्रित करके दिया जाता है, वह उन्हें अनन्त काल तक तृप्ति देने वाला है।'
      इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्व के अन्‍तगर्त दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक अट्ठासीवाँ अध्‍याय पूरा हुआ। Read the actual meaning of shlokas.
      pls don't propogate all nonsense in the psudo secularism.
      - J.P. Bajoria

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  2. ये बात उन लोगों को क्यूं नहीं समझ में आती जो राजनीती करते हे इस बात पर

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  3. अबे ओ जय सुधीर होश में आ जाओ। और सही भाषा का प्रयोग करो...ये मूत क्या होता है...अगर हिन्दू हो तो पता होना चाहीऐ कि मूत्र बोला जाता है। तुम्हारी ये पोस्ट तुम पर कानूनी कार्यवाही करवा सकती है।

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  4. jisko bhi sahi baat pata kerni ho vo ye description pade.... online bhi available hai search "महाभारत अनुशासनपर्व अध्याय 88 श्लोक 1-10" in google....

    महाभारत अनुशासनपर्व अध्याय 88 श्लोक 1-10
    अष्टाशीतितम (88) अध्याय :अनुशासनपर्व (दानधर्म पर्व)
    महाभारत: अनुशासनपर्व: अष्टाशीतितम अध्याय: श्लोक 1-10 का हिन्दी अनुवाद
    श्राद्ध में पितरों के तृप्तिविषय का वर्णन

    युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! पितरों के लिये दी हुई कौन-सी वस्तु अक्षय होती है? किस वस्तु के दान से पितर अधिक दिन तक और किसके दान से अनन्त काल तक तृप्त रहते हैं।

    भीष्म जी ने कहा- युधिष्ठिर! श्राद्धवेत्ताओं ने श्राद्ध-कल्पमय जो हविष्य नियत किये हैं, वे सब-के-सब काम्य हैं। मैं उनका तथा उनके फल का वर्णन करता हूं, सुनो। नरेश्‍वर! तिल, ब्रीहि, जौ, उड़द, जल और फल-मूल के द्वारा श्राद्ध करने से पितरों को एक मास तक तृप्ति बनी रहती है। मनु जी का कथन है कि जिस श्राद्ध में तिल की मात्रा अधिक रहती है, वह श्राद्ध अक्षय होता है। श्राद्ध सम्बन्धी सम्पूर्ण भोज्य पदार्थों में तिलों का प्रधान रूप से उपयोग बताया गया है। यदि श्राद्ध में गाय का दही दान किया जाये तो उससे पितरों को एक वर्ष तक तृप्ति होती बतायी गयी है। गाय के दही का जैसा फल बताया गया है, वैसा ही घृत मिश्रित खीर का भी समझना चाहिये।

    युधिष्ठिर! इस विषय में पितरों द्वारा गाई हुई गाथा का भी विज्ञ पुरुष गान करते हैं। पूर्वकाल में भगवान सनत्कुमार ने मुझे यह गाथा बतायी थी। पितर कहते हैं- ‘क्या हमारे कुल में कोई ऐसा पुरुष उत्पन्न होगा, जो दक्षिणायन में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में मघा और त्रियोदशी तिथी का योग होने पर हमारे लिये घृत मिश्रित खीर का दान करेगा?' ‘अथवा वह नियमपूर्वक व्रत का पालन करके मघा नक्षत्र में ही हाथी के शरीर की छाया में बैठकर उसके कान रूपी व्यजन से हवा लेता हुआ अन्न-विशेष चावल का बना हुआ पायश लोहषाक से विधि पूर्वक हमारा श्राद्ध करेगा ?' ‘पितरों की क्षय-तिथी को जल, मूल, फल उसका गूदा और अन्न आदि जो कुछ भी मधु मिश्रित करके दिया जाता है, वह उन्हें अनन्त काल तक तृप्ति देने वाला है।'
    इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्व के अन्‍तगर्त दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक अट्ठासीवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

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    2. जय सुधीर साले कुत्ते के बच्चे पहले संस्कृत सीख ले उसके बाद हिंदू धर्म के किसी भी श्लोक या ग्रंथ की व्याख्या करना

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  6. साले कुत्ते के बच्चे हैं सुधीर तेरे बाप को भी तुझे पैदा करने में शर्म आती होगी जैसी व्याख्या तू हिंदू ग्रंथों की कर रहा है

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  7. Teri bhan ka bhosda bhen ke lode mene mahabharat padhi h teri maa chodi thi rantidev ne jo bhen ke dalle tu paida hua

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